भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

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भाषाटीकासमेतम् ! ( ४७१ )

किञ्चित् वनान्तरम् आगच्छति तावत् स रुधिरप्लावितशरीरः तीक्ष्णचक्रेण मस्तके भ्रमता सवेदनः क्वणन् उपविष्टः तिष्ठति। तत्समीपवर्तिना भूत्वा सत्राष्पं पृष्टः—"भद्र ! किमेतत् ?" स आह,—विधिनियोगः" । स आह,—"कथं तत् कथय कारणमेतस्य"। सोऽपि तेन पृष्टः सर्वं चक्रवृत्तान्तम् अकथयत् । श्रुत्वा असौ तं विगर्हयन् इदमाह । "भो ! निषिद्धः त्वं मया अनेकशो न शृणोषि मे वाक्यम् । तत् किं क्रियते ! विद्यावानपि कुलीनोऽपि बुद्धिरहितः । अथवा साधु इदमुच्यते—

भैरवानन्दभी उनकी सिद्धिके निमित्त बहुतसे उपाय सोच चार सिद्ध वर्ती बनाकर अर्पण करता हुआ । और बोला—"हिमालयकी ओर जावो । वहां जानेमें जहा बत्ती गिरजाय, वहा अवश्य धनको प्राप्त होगे वह स्थान खोदकर धन ग्रहण कर प्रकाश करोगे" ऐसा करनेपर जाते हुए उनमेसे एकके हाथसे बत्ती गिर पडी, तब वह उस स्थानको खोदने लगा तो ताम्रमयी भूमि दृष्टिगोचर हुई । तब उसने कहा—"अहो ! अपनी इच्छासे ताम्रग्रहण करो" । और बोले"रे मूढ ! इसे लेकर क्या करेंगे । बडा दरिद्र तो नाश न होगा । सो उठो आगे चलो" । वह बोला,—"तुम जाओ मै तो आगे न जाऊंगा" । ऐसा कह यथेच्छ ताम्र ग्रहण कर पहला निवृत्त हुआ वे तीन आगे चले । तब कुछ दूर आगे चलकर और वत्ती गिरी । वहभी जब खोदने लगा तब चादीकी भूमि मिली । तब प्रसन्न होकर बोला—"भो ! यथेच्छ चादी ग्रहण करो आगे मत चलो" वह बोले—"भो ! पीछे ताम्रमयी भूमी यहा चादीकी । सो अवश्य आगे सुवर्णकी भूमी होगी। सो इस बहुतसेभी दरिद्र नाश न होगा सो हम दोनो आगे जाते हैं" ऐसा कहकर दोनों आगे चले । वहभी अपनी शक्तिसे चादीको लेकर निवृत्त हुआ । उन दोनोंके चलनेपर आगे फिर बत्ती गिरी । वह प्रसन्न होकर जब खोदने लगे तब सुवर्णभूमिको देख दूसरेसे बोला—"भो ! अपनी इच्छासे सुवर्ण ग्रहण करो । सुवर्णसे और कुछ उत्तम न होगा" । वह बोला—"मूर्ख ! तू कुछ नहीं जानता पहले तावा फिर चादी फिर सोना, अब इसके आगे अवश्य रत्न होंगे । जिनके पानेमें एकसेही दरिद्रका नाश होजायगा ।