भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

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पृष्ठ 487

( ४७२ ) पञ्चतन्त्रम् ।

सो उठ आगे चलैं, इस महाबोझके धारणसे क्या" । वह बोला-“जाओ मैं यहीं बैठा तुम्हारी वाट देखता हूं” । ऐसा कहनेपर वहभी इकला जाता हुआ गरमीके सूर्यतापसे तप्त शरीर हुआ प्याससे व्याकुल हो सिद्धपथसे भ्रष्ट हो इधर उधर घूमने लगा । तब घूमता हुआ स्थलके ऊपर एक पुरुषको रुधिरसे प्लावित शरीर मस्तकपर चक्र घूमता हुआ देखा सो बहुत शीघ्र जाकर उससे बोला-“भो ! आप कौनहो ? किस प्रकार शिरंपेर चक्र घूमते हुए तुम स्थित हो ? सो बताओ मुझे यदि कहीं जल हो तो” ऐसा उसके कहतेही उसी क्षण उसके शिरसे ( वहचक्र ) ब्राह्मणके शिरमें पतित हुआ, वह बोला-“भद्र ! यह क्या है ? जो मेरेभी यह शिरपर पडने लगा । सो कहो यह कब उतरेगा ? । मुझे बडा दुःख है”। वह बोला-“जब तेरीसमान कोई सिद्धबत्ती हाथमें लिये आकर तुझसे बात करेगा, तब यह उसके मस्तकपर पतित होगा”। वह बोला-“यहां रहते तुझको कितना समय हुआ ?” वह बोला-“इस समय पृथ्वीतलमें कौन राजा है?” वह बोला-“वीणावत्स राजा है”। वह बोला-“मैं कालसंख्याको तो नहीं जानता । परन्तु जब राम राजाथे तब मैं दरिद्रताके कारण सिद्धबत्ती लेकर इस मार्गसे आया था । तब मैंने और एक मनुष्य जिसके मस्तकपर चक्र घूमता था देखकर उससे पूछा । तब मेरे ऐसा होगया” । वह बोला-“भद्र ! किस प्रकार तुम्हें यहां जल और भोजनकी प्राप्ति होती है” वह बोला-“भद्र ! कुबेरने धन हरणके भयसे सिद्धोंको यह भय दिखाया है । जिससे कोई भी यहां नही आता है और यदि कोई आता है तो क्षुधा पिपासा निद्रासे रहित जरामरणसे रहित हो केवल वेदनाको अनुभव करता है । सो मुझे घर जानेको आज्ञादो” ऐसा कहकर गया । तब उसको देर होनेपर वह सुवर्णसिद्धि उसको ढूंढता हुआ उसकी पद पंक्तिसे जबतक कुछ वनान्तरमें जाता है, तबतक उसको रुधिरसे प्लावितशरीर तीक्ष्ण चक्र मस्तकपर घूमता वेदनासे व्याकुल विलाप करते हुए बैठा पाया । उसके समीपवर्ती हो आंखोंमें आंसू भरकर उसने पूछा-“भद्र ! यह क्या है” ? उसने कहा-“प्रारब्धका नियोग है” वह बोला-“कैसे” ? वह उससे पूछा हुआ सम्पूर्ण चक्रके वृत्तान्तको कहता हुआ । यह सुन वह इसकी निन्दा करता हुआ इस प्रकार बोला,-“भो ! मैंने अनेकवार निषेध किया परन्तु तैने मेरा बचन न सुना । सो क्या किया जाय । विद्यावान् कुलीन भी बुद्धिरहित होता है । अथवा अच्छा कहा है-