भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

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( ४१६ )पञ्चतन्त्रम् ।

अभावसे कभी जलती लकडीसे ताडन किया तो तौ बहुत ऊनवाला यह मेष स्वल्प अग्निसेभी जल जायगा । सो यह जलता हुआ समीपवर्ती अश्वशालामें प्रवेश करेगा । वहभी तृणके अधिक होनेसे प्रज्वलित हो जायगी । तब घोडे अग्निसे जल जांयगे । अश्वशास्त्रके ज्ञाताने कहाहै वानरोंकी चरबीसे घोडोंका अग्निदोष शान्त होताहै । सो अवश्यही यह होगा निश्चयहै । ऐसा निश्चयकर सब वानरोंको बुलाकर एकान्तमें बोला । कि-

मेषेण सूपकाराणां कलहो यत्र जायते ।
स भविष्यत्यसन्दिग्धं वानराणां क्षयावहः ॥ ७५ ॥

जहां मेषके साथ सूपकारोंका क्लेश होताहै वह अवश्य वानरोंके क्षयके निमित्त होताहै ॥ ७५ ॥

तस्मात्स्यात्कलहो यत्र गृहे नित्यमकारणः ।
तद्गृहं जीविने वाञ्छन्दूरतः परिवर्जयेत् ॥ ७६ ॥

इस कारण जहां घरमें नित्य अकारण क्लेश होतारहे, जीनेकी इच्छा करनेवाला दूरसेही उस घरको त्यागन करदे ॥ ७६ ॥

तथाच-
और देखो-

कलहान्तानि हर्म्याणि कुवाक्यान्तञ्च सौहृदम् ।
कुराजान्तानि राष्ट्राणि कुकर्मान्तं यशो नृणाम् ॥ ७७ ॥

कलहसे स्थान नष्ट होजातेहैं, कुवाक्यसे मित्रता नष्ट होजातीहै, कुराजासे देश नष्ट होजाते हैं, कुकर्मोंसे मनुष्योंके यश नष्ट होजातेहैं ॥ ७७ ॥

तन्न यावत् सर्वेषां संक्षयो भवति तावदेतत् राजगृहं सन्त्यज्य वनं गच्छामः" । अथ तत् तस्य वचनम् अश्रद्धेयं श्रुत्वा मदोद्धता वानराः प्रहस्य प्रोचुः-“भो ! भवतो वृद्ध-भावात् बुद्धिवैकल्यं सञ्जातं येन एतद्ब्रवीषि । उक्तञ्च-

सो जबतक सबका संक्षय न हो तबतक यह राजगृह छोडकर वनको चलें" । तब उसके वचनको श्रद्धाके अयोग्य सुनकर मदसे उद्धत हुए वानर हँसकर बोले-“भो ! आपको वृद्धतासे बुद्धिकी विकलता प्राप्त हुईहै जिससे ऐसा कहतेहो । कहा है-

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