पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)
Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary
पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम् । ( ६७ )
कह शृंगारकर जबतक देवदत्तके निकट चली कि, तबतक उसका भर्ता सामनेसे मदसे विह्वल शरीर बाल खोले पग पगपर गिरता हुआसा मद्यका बर्तन ग्रहणकरे हुए आया । उसको देख वह बहुत शीघ्र लौटकर तत्काल शृंगार उतार पूर्ववत् स्थित हुई । कौलिकभी उसे भागती हुई अद्भुत शृंगार किये देखकर प्रथम ही कर्णपरम्परासे उसकी निन्दासे क्षुभित हृदय हुआ अपने आकारको छिपाये हुए सदा स्थित रहताथा । उसकी इस प्रकारकी चेष्टाको देख उसवातका विश्वासकर क्रोधसे घरमे प्रवेश कर उससे बोला-"आः पापे व्यभिचारिणी ! कहा जाती है ?" वह बोली-"मैं तुम्हारे पाससे आकर कहींभी नहीं निकली, सो किसप्रकार मद्यपान करके अप्रस्तुत वचन बोलते हो" । अथवा सत्य कहा है-
वैकल्यं धरणीपातमयथोचितजल्पनम् ।
सन्निपातस्य चिह्नानि मद्यं सर्वाणि दर्शयेत् ॥ १८८ ॥
विक्वलता, धरणीपर गिरना, जो मनमे आये सो वकना, यह सन्निपातके चिन्ह मद्यंम सब स्थित रहते हैं ॥ १८८ ॥
करस्पन्दोऽम्बरत्यागस्तेजोहानिः सरागता ।
वारुणीसंगजावस्था भानुनाप्यनुभूयते ॥ १८९ ॥
हाथमें कंपकपी, वस्त्रत्याग, तेजहानि, रागता, यह वारुणीपानकी अवस्था सूर्यसे भी अनुभव कीजाती है, अन्यकी कौन कहे पश्चिम दिशामें अस्त होते समय सूर्यकी यही दशा होतो है ॥ १८९ ॥
सोऽपि तच्छ्रुत्वा प्रतिकूलवचनं वेशविपर्य्ययं च अवलोक्य तामाह—“पुंश्चलि ! चिरकालं श्रुतो मया तव अपवादः। तदद्य स्वयं सञ्जातप्रत्ययः तव यथोचितं निग्रहं करोमि” इति अभिधाय लगुडप्रहारैः तां जर्जरितदेहां विधाय स्थूणया सह दृढबन्धनन बद्धा सोऽपि मदविह्वलो निद्रावशमगमत्। अत्रान्तरे तस्याः सखी नापिती कौलिकं निद्रावशगतं विज्ञाय तां गत्वा इदमाह—“सखि ! स देवदत्तः तस्मिन् स्थाने त्वां प्रतीक्षते तच्छीघ्रमागम्यताम्॥” इति। सा च आह-‘पश्य मम अवस्थाम्। तत्कथं गच्छामि ? तद्गत्वा