भारतकोश
पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation

महर्षि पराशर द्वारा

स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished170 पृष्ठ

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अध्यायः ] भाषाटीकासहिता ९९ औषध पिलाने के निमित्त अथवा उदरस्थ मृत बछड़े को निकालने के लिए बँधी हुई गाय के मरने पर कोई दोष नहीं लगता है ॥४५॥ व्यापन्नानां बहूनां च बन्धने रोधनेऽपि वा । भिषङ्मिथ्योपचारे१ च प्रायश्चित्तं विनिर्दिशेत् ॥४६॥ बाँधने या रोकने से अथवा पशु-चिकित्सक के गलत उपचार के द्वारा यदि बहुत सी गायों का निधन हो जाय तो प्रायश्चित्त करना आवश्यक होता है ॥४६॥ गो-वृषाणां विपत्तौ च यावन्तः प्रेक्षका जनाः । अनिवारयतां तेषां सर्वेषां पातकं भवेत् ॥४७॥ यदि गाय या बैल किसी कुएँ आदि में या और किसी प्रकार मर जायें और दर्शकों द्वारा उनको बचाने का प्रयास न किया जाय तो उसका प्रायश्चित्त लगता है ॥४७॥ एको हतो यैर्बहुभिः समेतैर्न ज्ञायते यस्य हतोऽभिघातात् । दिव्येन तेषामुपलभ्य हन्ता निवर्तनीयो नृपसन्नियुक्तः ॥४८॥ जब कई व्यक्तियों ने एक साथ मिलकर सम्मिलित वध किया हो और इस बात का निश्चय न हो सके कि किसके प्रहार से गोहत्या हुई है, तो राज-द्वारा नियुक्त मनुष्य को चाहिए कि हत्यारों को शपथ दिलाकर मारनेवाले का निर्णय करे और सबके समक्ष उसे अलग करके सब लोगों को दिखला दे ॥४८॥ एका चेद् बहुभिः काचिद् दैवाद् व्यापादिता भवेत्२ । पादं पादं तु हत्यायाश्चरेयुक्ते पृथक् पृथक् ॥४९॥ यदि एक गाय को किसी मनुष्य ने मारा हो तो उन सब व्यक्तियों को अलग-अलग सम्पूर्ण व्रत का चतुर्थांश प्रायश्चित्त के रूप में करना चाहिए ॥४९॥ १. ‘-मिथ्यापचारेण’ इति पा० । ‘-मिथ्यापचारे’ इति । २. ‘क्वचित्’ इति ।