भारतकोश
पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation

महर्षि पराशर द्वारा

स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished170 पृष्ठ

पृष्ठ 112, कुल 170 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 112

१७० पाराशरस्मृतिः [ नवमो- हते तु रुधिरं दृश्यं व्याधिग्रस्तः कृशो भवेत् । लाला भवति १दष्टेषु एवमन्वेषणं भवेत् ॥५०॥ गाय की मृत्यु के कारण का निश्चय इस प्रकार करना चाहिए— यदि रक्त दिखाई पड़े तो वध द्वारा, दुर्बलता के कारण मृत्यु होने से बीमारी द्वारा और मुंह से झाग या फेन निकलने पर सर्पदंशन द्वारा मृत्यु का कारण समझना चाहिए । ५०॥ ग्रासार्थं चोदितो वाऽपि अध्वानं नैव गच्छति । मनुना चैवमेकेन सर्वशास्त्राणि जानता ॥५१॥ खाने के लिए प्रोत्साहित करने पर भी यदि गाय अपने स्थान से न हिले तो उसे क्लेशित समझना चाहिए। ऐसा सर्वशास्त्रवेत्ता मनु ने बतलाया है ॥५१॥ प्रायश्चित्तं तु तेनोक्तं गोघ्नश्चान्द्रायणं चरेत् । केशानां रक्षणार्थाय द्विगुणं व्रतमाचरेत् ॥५२॥ उन्होंने गोहत्या को प्रायश्चित्त के रूप में चान्द्रायण नामक व्रत का अनुष्ठान करने का निर्देश किया है और केशों का मुण्डन न कराने पर दुगुने व्रत का विधान बतलाया है ॥५२॥ द्विगुणे व्रत आदिष्टे द्विगुणा दक्षिणा भवेत् । राजा वा राजपुत्रो वा ब्राह्मणो वा बहुश्रुतः ॥५३॥ दुगुना व्रत करने में दक्षिणा भी दुगुनी देनी पड़ती है। राजा, राजपुत्र अथवा बहुश्रुत ब्राह्मण ॥५३। अकृत्वा वपनं तेषां प्रायश्चित्तं विनिर्दिशेत् । यस्य न द्विगुणं दानं केशश्च परिरक्षितः ॥५४॥ यदि गोहत्या में हत्यारे का सिर मुड़ाये बिना दुगुना प्रायश्चित्त न करे ॥५४॥ १. 'दंष्ट्रेषु' इति ।