पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation
महर्षि पराशर द्वारा
स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)
१७० पाराशरस्मृतिः [ नवमो- हते तु रुधिरं दृश्यं व्याधिग्रस्तः कृशो भवेत् । लाला भवति १दष्टेषु एवमन्वेषणं भवेत् ॥५०॥ गाय की मृत्यु के कारण का निश्चय इस प्रकार करना चाहिए— यदि रक्त दिखाई पड़े तो वध द्वारा, दुर्बलता के कारण मृत्यु होने से बीमारी द्वारा और मुंह से झाग या फेन निकलने पर सर्पदंशन द्वारा मृत्यु का कारण समझना चाहिए । ५०॥ ग्रासार्थं चोदितो वाऽपि अध्वानं नैव गच्छति । मनुना चैवमेकेन सर्वशास्त्राणि जानता ॥५१॥ खाने के लिए प्रोत्साहित करने पर भी यदि गाय अपने स्थान से न हिले तो उसे क्लेशित समझना चाहिए। ऐसा सर्वशास्त्रवेत्ता मनु ने बतलाया है ॥५१॥ प्रायश्चित्तं तु तेनोक्तं गोघ्नश्चान्द्रायणं चरेत् । केशानां रक्षणार्थाय द्विगुणं व्रतमाचरेत् ॥५२॥ उन्होंने गोहत्या को प्रायश्चित्त के रूप में चान्द्रायण नामक व्रत का अनुष्ठान करने का निर्देश किया है और केशों का मुण्डन न कराने पर दुगुने व्रत का विधान बतलाया है ॥५२॥ द्विगुणे व्रत आदिष्टे द्विगुणा दक्षिणा भवेत् । राजा वा राजपुत्रो वा ब्राह्मणो वा बहुश्रुतः ॥५३॥ दुगुना व्रत करने में दक्षिणा भी दुगुनी देनी पड़ती है। राजा, राजपुत्र अथवा बहुश्रुत ब्राह्मण ॥५३। अकृत्वा वपनं तेषां प्रायश्चित्तं विनिर्दिशेत् । यस्य न द्विगुणं दानं केशश्च परिरक्षितः ॥५४॥ यदि गोहत्या में हत्यारे का सिर मुड़ाये बिना दुगुना प्रायश्चित्त न करे ॥५४॥ १. 'दंष्ट्रेषु' इति ।
ऽध्याय ] भाषाटीकासहिता १०१ तत्पापं तस्य तिष्ठेत १वक्ता च नरकं व्रजेत् । यत्किञ्चित् क्रियते पापं सर्वं केशेषु तिष्ठति ॥५५॥ तो वह स्वयं पातकी होता है और बतलानेवाला नरकगामी होता है, क्योंकि सभी प्रकार के किये हुए पाप केशों में विद्यमान रहते हैं ॥५५॥ सर्वान् केशान् समुद्धृत्य छेदयेदङ्गुलद्वयम् । एवं नारी-कुमारीणां शिरसो मुण्डनं स्मृतम् ॥५६॥ विवाहिता अथवा अविवाहिता स्त्री के मुण्डन में केश के ऊपरी सिरे को पकड़कर दो-दो अंगुल बाल काट लेना चाहिए ॥५६॥ न स्त्रियाः केशवपनं न दूरे शयनाऽऽसनम् । न च गोष्ठे वसेद् रात्रौ न दिवा गा अनुव्रजेत् ॥५७॥ स्त्रियों के समस्त केशों को मूंडना, अलग होकर सोना, बैठना, गोशाले में रहकर रात बिताना और दिन में गायों के झुण्ड के पीछे- पीछे घूमना—ये सब कार्य वर्जित होते हैं। ५७॥ नदीषु सङ्गमे चैव अरण्येषु विशेषतः । न स्त्रीणामजिनं वासो व्रतमेवं समाचरेत् ॥५८॥ नदियों के संगमस्थान, विशेषतः वनों में वास तथा मृगछाला आदि को धारण न कराकर व्रत का अनुष्ठान कराना चाहिए ॥५८॥ त्रिसन्ध्यं स्नानमित्युक्तं सुराणामर्चनं तथा । बन्धुमध्ये व्रतं तासां कृच्छ्र-चान्द्रायणादिकम् ॥५९॥ त्रिकाल स्नान, देवताओं की अर्चना और अपने बन्धुवर्गों में निवास करना ही स्त्रियों का कृच्छ्र-चान्द्रायण व्रत माना गया है ॥५९॥ गृहेषु सततं तिष्ठेच्छुचिर्नियममाचरेत् । इह यो गोवधं कृत्वा प्रच्छादयितुमिच्छति ॥६०॥ १. 'त्यक्त्वा' इति पा० । २. 'शयनाऽशनम्' इति ।
१०२. पराशरस्मृतिः [ दशमो- घर में सदैव पवित्र रहकर स्त्रियां नियमपूर्वक आचरण करें। जो गोघातक अपने गोवध को संसार की दृष्टि में छिपाने का प्रयास करता है ॥६०॥ स याति नरकं घोरं कालसूत्रमसंशयम् । विमुक्तो नरकात्तस्मात् मर्त्यलोके प्रजायते ॥६१॥ वह निश्चय ही घोर कालसूत्र नामक नरक में वास करता है। उस नरक से मुक्त होनेके बाद जब वह पुनः मृत्युलोक में आता है तब ॥ ६१ ॥ क्लीबो दुःखी च कुष्ठी च सप्तजन्मनि वै नरः । तस्मात् प्रकाशयेत् पापं स्वधर्मं सततं चरेत् ॥६२॥ वह प्राणी नपुंसक, दुखी और कोढ़ी होकर सात जन्म तक कष्ट भोगता रहता है। इसलिए अपने किये हुए पापों को गुप्त न रखकर उन्हें सब लोगों पर प्रकट करके सदैव धर्माचरण में तत्पर रहना चाहिए ॥६२॥ स्त्री-बाल-भृत्य-गो-विप्रेष्वतिकोपं विवर्जयेत् ॥६३१/२॥ इति पाराशरीये धर्मशास्त्रे गोरक्षणार्थे गोविपत्तिप्रायश्चित्त नाम नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥ स्त्री, बालक, सेवक, गौ और ब्राह्मण के ऊपर कभी भी अत्यन्त क्रोध नहीं करना चाहिए ॥ ६३१/२ ॥ इस प्रकार ‘शिवदत्ती’ हिन्दीटीका में पराशरप्रोक्त धर्मशास्त्र में नवाँ अध्याय समाप्त ॥ ९ ॥ ❀ १०. दशमोऽध्यायः चातुर्वर्ण्येषु सर्वेषु हितं वक्ष्यामि निष्कृतिम् । अगम्यागमने चैव १शुद्धौ चान्द्रायणं चरेत् ॥ १ ॥ १. ‘शुद्ध्यै’ इति ।
ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता १०३ अब मैं ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र-इन चारों वर्णों की शुद्धि का उपाय बतलाऊँगा। अपनी पत्नी के अतिरिक्त अन्य अगम्या स्त्रियों से गमन करने पर चान्द्रायण व्रत से शुद्धि होती है ॥ १ ॥ एकैकं हासयेद् ग्रासं कृष्णे शुक्ले च वर्द्धयेत् । अमावास्यां न भुञ्जीत ह्येष चान्द्रायणो विधिः ॥ २ ॥ चान्द्रायण व्रत की विधि इस प्रकार है : कृष्णपक्ष में भोजन का क्रमशः एक-एक ग्रास घटाकर शुक्लपक्ष में एक-एक कौर बढ़ाते रहना चाहिए और अमावास्या के दिन निराहार व्रत करना चाहिए ॥ २ ॥ कुक्कुटाण्डप्रमाणं तु ग्रासं व परिकल्पयेत् । अन्यथा ¹जातदोषेण न धर्मो न च ²शुद्ध्यति ॥ ३ ॥ भोजन के ग्रास का प्रमाण अण्डे के बराबर होना चाहिए। इसकी मात्रा में कमी-वेशी करने से दोष का भागी होना पड़ता है और शुद्धि नहीं होती ॥ ३ ॥ प्रायश्चित्ते ततश्चीर्णे कुर्याद् ब्राह्मणभोजनम् । गोद्वयं वस्त्रयुग्मं च दद्याद् विप्रेषु दक्षिणाम् ॥ ४ ॥ प्रायश्चित्त करने के अनन्तर ब्राह्मण को भोजन कराकर दक्षिणा- स्वरूप दो गाय और एक जोड़ा वस्त्र देना चाहिए ॥ ४ ॥ चाण्डालीं वा श्वपाकीं वा ³ह्यभिगच्छति यो द्विजः । त्रिरात्रमुपवासित्वा⁴ विप्राणामनुशासनात् ॥ ५ ॥ जो ब्राह्मण चाण्डाल या श्वपच जाति की स्त्री से मैथुन करता है, उसे चाहिए कि वह ब्राह्मणों की आज्ञा लेकर, ॥ ५ ॥ स शिखं वपनं कृत्वा प्राजापत्यद्वयं चरेत् । ब्रह्मकूर्चं ततः कृत्वा कुर्याद् ब्राह्मणतर्पणम् ॥ ६ ॥ १. 'भावदोषेण' इति । २. 'शुद्ध्यते' इति । ३. 'अनुगच्छति' इति । ४. 'त्रिरात्रमुपवासी च' इति ।
१०४ पाराशरस्मृतिः [ दशमो- तीन दिन-रात उपवास करे और शिखा सहित सिर मुँड़वाकर प्राजापत्य नामक व्रत का अनुष्ठान करे । इसके अनन्तर ब्रह्मकूर्च नामक व्रत पूरा करके ब्राह्मण को भोजन दे ॥ ६ ॥ गायत्रीं च जपेन्नित्यं दद्याद् गोमिथुनद्वयम् । विप्राय दक्षिणां दद्याच्छुद्धिमाप्नोत्यसंशयम् ॥ ७ ॥ तदनन्तर प्रतिदिन गायत्री का पाठ करे और अन्त में ब्राह्मण को दो बैल, दो गाय और दक्षिणा दान करे। इस प्रकार के अनुष्ठान से वह ब्राह्मण निश्चय ही पवित्र हो जाता है ॥ ७ ॥ गोद्वयं दक्षिणां दद्याच्छुद्धिं पाराशरोऽब्रवीत् । क्षत्रियो वाऽथ वैश्यो वा चाण्डालीं गच्छतोऽपि¹वा ॥८ ॥ महर्षि पाराशर ने शुद्धि के निमित्त दक्षिणा में दो गायों के दान का निर्देश किया है। यदि क्षत्रिय या वैश्य चाण्डाल की स्त्री से सहवास करे तो ॥ ८ ॥ प्राजापत्यद्वयं कुर्याद् दद्याद् गोमिथुनं²द्वयम् । श्वपाकीं वाऽथ चाण्डालीं शूद्रो वा यदि गच्छति ॥ ९ ॥ उसे चाहिए कि वह दो प्राजापत्य व्रत करके दो गाय और दो बैल दान में देवे । यदि शूद्र जाति का मनुष्य श्वपच या चाण्डाल की पत्नी से मैथुन करे तो ॥ ९ ॥ प्राजापत्यं चरेत् कृच्छ्रं चतुर्गोमिथुनं ददेत् । मातरं यदि गच्छेत्तु भगिनीं स्वसुतां तथा ॥१०॥ उसे चाहिए कि प्राजापत्य कृच्छ्र नामक व्रत करके चार-चार की संख्या में गाय और बैल का दान देवे। यदि कोई व्यक्ति मोहासक्त होकर अपनी माता, बहन और पुत्री से सम्भोग कर बैठे ॥ १० ॥ १ 'गच्छतो यदि' इति । २. 'गोमिथुनं तथा' इति ।
ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता १०५ एतास्तु मोहितो गत्वा त्रीणि कृच्छ्राणि सञ्चरेत् । चान्द्रायणत्रयं कुर्याल्लिङ्गनच्छेदेन शुद्ध्यति ॥११॥ तो तीन-तीन कृच्छ्र और चान्द्रायण व्रत करके अन्त में जननेन्द्रिय को ही काट डालना चाहिए ॥११॥ मातृष्वसृगमे चैवमात्ममेढ्रनिकृन्तनम् । १अज्ञानेन तु यो गच्छेत् कुर्याच्चान्द्रायणत्रयम् ॥१२॥ इसी प्रकार यदि अपनी मौसी ( माता की वहन ) से सम्भोग करे तब भी उसे जननेन्द्रिय का छेदन कर डालना उचित है । यदि अनजान में समागम हुआ हो तो उसे तीन चान्द्रायण करने के बाद ॥१२॥ दशगोमिथुनं दद्याच्छुद्धिं पाराशरोऽब्रवीत् । पितृदारान् समारुह्य मातुराप्तां च भ्रातृजाम् ॥१३॥ दस-दस की संख्या में गाय और बैल का दान करना चाहिए । ऐसा करने से उसकी शुद्धि हो जाती है । विमाता, माता की सहेली, भ्रातृ-तनया, ॥ १३ ॥ गुरुपत्नीं स्नुषां चैव भ्रातृभार्या तथैव च । मातुलानीं स-गोत्रां च प्राजापत्यत्रयं चरेत् ॥१४॥ गुरु-पत्नी, पुत्रवधू ( पतोहू ), भाई की पत्नी, मामी सगोत्रीय स्त्रियों के साथ मैथुन करने पर तीन प्राजापत्य व्रत का विधान कहा गया है ॥ १४ ॥ गोद्वयं दक्षिणां दत्वा शुद्ध्यते नाऽत्र संशयः । पशु-वेश्यादिगमने महिष्युष्ट्री-कपीस्तथा ॥१५॥ तत्पश्चात् दक्षिणा में दो गायों का दान देने से पूर्णरूपेण शुद्धि प्राप्त होती है । पशु, वेश्या, मादा भैंस, ऊँटिन, बन्दरी, ॥ १५ ॥ खरीं च सूकरीं गत्वा प्राजापत्यव्रतं चरेत् । गोगामी च त्रिरात्रेण गामेकां ब्राह्मणे ददेत् ॥१६॥ १ 'अज्ञानात्ता' इति । २. 'चान्द्रायणद्वयम्' इति ।
[शीर्षक] १०६ पाराशरस्मृतिः [ दशमो-
गधी और सूअर के साथ गमन करने से प्राजापत्य व्रत करना चाहिए। गाय के साथ रमण करने से तीन दिन-रात निरन्तर उपवास करके दक्षिणा में ब्राह्मण को एक गाय देनी चाहिये ॥ १६ ॥ महिष्युष्ट्री-खरीगामी त्वहोरात्रेण शुद्ध्यति । १अमरे समरे वाऽपि दुर्भिक्षे वा जनक्षये ॥१७॥ भैंस, ऊँटनी और गधी के साथ एक बार गमन करने से एक दिन तक उपवास करके वह व्यक्ति शुद्धता पा लेता है। डकैती, युद्ध, अकाल, महामारी, ॥ १७ ॥ वन्दिग्राहे भयार्तो वा सदा स्वस्त्रीं निरीक्षयेत् । चाण्डालैः सह सम्पर्कं या नारी कुरुते ततः ॥१८॥ बलपूर्वक दासीकरण करना, राजा और चोर के डर से सदैव अपनी पत्नी की रक्षा करते रहना। चाण्डालों के साथ रमण करनेवाली स्त्री को चाहिए कि, ॥ १८ ॥ विप्रान् दश वरान् कृत्वा स्वकं दोषं प्रकाशयेत् । आकण्ठसम्मिते कूपे गोमयोदककर्दमे ॥१९॥ वह दश कुलीन ब्राह्मणों के समक्ष अपने किये हुए दोषों को स्वीकार कर ले और किसी कूप या गड्ढे के जल में कण्ठ तक गोबर का कीचड़ बनाकर ॥ १९ ॥ तत्र स्थित्वा निराहारा त्वहोरात्रेण निष्क्रमेत् । स-शिखं वपनं कृत्वा भुञ्जीयाद्यावकौदनम् ॥२०॥ उसमें दिन-रात निराहार रहकर खड़ी रहे। तत्पश्चात् दूसरे दिन उस गढ़े से बाहर आकर समूचे सिर का मुण्डन करा डाले और यव का भात बनाकर भोजन करे ॥ २० ॥ त्रिरात्रमुपवासित्वा त्वेकरात्रं जले वसेत् ।
[पाद-टिप्पणी] १. 'डामरे' इत्यपि पाठः ।
[Header Left]: ऽध्यायः ] [Header Center]: भाषाटीकासहिता [Header Right]: १०७
शङ्खपुष्पीलतामूलं पत्रं वा कुसुमं फलम् ॥२१॥ इसके बाद तीन दिन तक उपवास करके एक दिन-रात जल में खड़ा रहे। फिर सातवें दिन शंखपुष्पी नामक लता के पंचांग (फल, फूल, मूल, पत्ती आदि) में से किसी एक को लेकर ॥२१॥ सुवर्णं १पञ्चगव्यं च क्वाथयित्वा पिबेज्जलम् । एकभक्तं चरेत् पश्चाद्यावत् पुष्पवती भवेत् ॥२२॥ इसके साथ सोना और पंचगव्य मिला ले। फिर उपर्युक्त वस्तुओं को जल में उबालकर उसका काढ़ा तैयार करे और उस काढ़े का पान करे। जब तक पुनः रजस्वला न हो तब तक नियमपूर्वक इस एकभक्त व्रत को करती रहे ॥२२॥ व्रतं चरति तद्यावत्तावत् संवसते बहिः । प्रायश्चित्ते ततश्चीर्णे कुर्याद् ब्राह्मणभोजनम् ॥२३॥ व्रतकाल में घर के बाहर ही निवास करे और प्रायश्चित्त पूरा करके ब्राह्मण को भोजन कराना चाहिए ॥२३॥ गोद्वयं दक्षिणां दद्याच्छुद्धिं पाराशरोऽब्रवीत् । चातुर्वर्ण्यस्य नारीणां कृच्छ्रं चान्द्रायणं स्मृतम् ॥२४॥ तत्पश्चात् दक्षिणास्वरूप ब्राह्मण को दो गायें प्रदान करनी चाहिए। ऐसा महर्षि पाराशर का मत है। यदि स्वेच्छा से चारों वर्ण की स्त्रियाँ चाण्डाल से सहवास करें तो एक कृच्छ्र और एक चान्द्रायण व्रत करने से उनकी शुद्धि हो जाती है ॥२४॥
१. पलमात्रं दुग्धभागं गोमूत्रं तावदिष्यते । घृतं च पलमात्रं स्याद् गोमयं तोलकद्वयम् ॥ दधिप्रसृतमात्रं स्यात् पञ्चगव्यमिदं स्मृतम् । अथवा पञ्चगव्यानां समानो भाग इष्यते ।' योषशकृद् द्विगुणं मूत्रं पयः स्यात्तच्चतुर्गुणम् । घृतं तद् द्विगुणं प्रोक्तं पञ्चगव्ये तथा दधि ॥—गौतमीतन्त्रे
CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri १०८ पाराशरस्मृतिः [ दशमो- यथा भूमिस्तथा नारी तस्मात्तां न तु दूषयेत् । बन्दिग्राहेण या भुक्ता हृत्वा बद्ध्वा बलाद् भयात् ॥२५॥ स्त्रियों को धरती के समान ही कहा गया है, इससे उनके दोषों पर ध्यान नहीं देना चाहिए। जिस स्त्री के साथ बलपूर्वक उसे बाँधकर, दासी बनाकर या उसे भयभीत करके रमण किया गया हो ॥२५॥ कृत्वा सान्तपनं कृच्छ्रं शुद्ध्येत पाराशरोऽब्रवीत् । सकृद्भुक्ता तु या नारी नेच्छन्ती पापकर्मभिः ॥२६॥ तो ऐसी स्त्री सान्तपन कृच्छ्र व्रत के अनुष्ठान से दोषमुक्त हो जाती है। ऐसी बात पाराशर ने कही है। यदि किसी दुरात्मा ने स्त्री की अनिच्छा से केवल एक ही बार सम्भोग किया हो ॥२६॥ प्राजापत्येन शुद्ध्येत ऋतुप्रस्रवणेन च । पतत्यर्द्धं शरीरस्य यस्य भार्या सुरां पिवेत् ॥२७॥ तो वह स्त्री प्राजापत्य व्रत और ऋतुकाल में रजोस्राव होने से ही शुद्धता को प्राप्त हो जाती है। जिस मनुष्य की पत्नी मद्यपान कर ले, तो उस पुरुष के शरीर का आधा अंश दूषित और पतित हो जाता है ॥२७॥ पतिताद्र्धशरीरस्य निष्कृतिर्न विधीयते । गायत्रीं जपमानस्तु कृच्छ्रं सान्तपनं चरेत् ॥२८॥ इस प्रकार के पतितों की शुद्धि नहीं हो सकती। उसे गायत्री मन्त्र का जप और कृच्छ्र सान्तपन व्रत का अनुष्ठान करना उचित है ॥२८॥ गोमूत्रं गोमयं क्षीरं दधि सर्पिः कुशोदकम् । एकरात्रोपवासश्च कृच्छ्रं सान्तपनं स्मृतम् ॥२९॥ एक दिन गोमूत्र, दूसरे दिने गोबर, तीसरे दिन गाय का दूध, चौथे दिन दही, पाँचवें दिन घी, छठे दिन कुशा का जल पीकर और Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal
ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता १०९ सातवें दिन निर्जल उपवास करने का नाम ही कृच्छ्र-सान्तपन व्रत है ॥२९॥ जारेण जनयेद् गर्भं मृते त्यक्ते गते पतौ । तां त्यजेदपरे राष्ट्रे पतितां पापकारिणीम् ॥३०॥ जो स्त्री अपने पति के मरने, पति द्वारा त्यागे जाने और पति के विदेश गमन करने पर किसी पर-पुरुष द्वारा गर्भाधान कर ले तो उस पतिता नारी को किसी दूसरे राज्य में ले जाकर निर्वासित कर देना चाहिए ॥३०॥ ब्राह्मणो तु यदा गच्छेत् परपुंसा समन्विता । सा तु नष्टा विनिर्दिष्टा न तस्याऽऽगमनं पुनः ॥३१॥ यदि ब्राह्मण की पत्नी किसी पर-पुरुष के साथ चली जाय तो वह नष्टा कहलाती है, उसका पुनः आगमन नहीं होता ॥३१॥ कामान्मोहात्तु या गच्छेत् त्यक्त्वा बन्धून् सुतान् पतिम् । साऽपि नष्टा परे लोके मानुषेषु विशेषतः ॥३२॥ जो स्त्री अपने बन्धु, पुत्र और पति को छोड़कर काम या मोह के वशीभूत होकर किसी अन्य पुरुष के साथ चली जाय तो वह इहलोक तथा परलोक दोनों में नष्टा होती है ॥३२॥ मद-मोहगता नारी क्रोधाद् दण्डादिताडिता । अद्वितीया गता चैव पुनरागमनं भवेत् ॥३३॥ जो स्त्री मतवाली होकर या किसी प्रकार दण्डित होकर क्रोधवश कहीं अन्यत्र चली जाय तो उसका पुनरागमन हो सकता है ॥३३॥ दशमे तु दिने प्राप्ते प्रायश्चित्तं न विद्यते । दशाहं न त्यजेन्नारीं त्यजेन्नष्टश्रुतां तथा ॥३४॥ यदि ऐसी स्त्री को दस दिन तक लगातार बाहर ही रहना पड़े तो उसका प्रायश्चित्त नहीं होता। इसलिए स्त्री का दस दिनों तक परित्याग
११० पराशरस्मृतिः [ दशमो- नहीं करना चाहिए । त्याग कर देने से वह स्त्री स्वयं तो भ्रष्ट हो ही जाती है, साथ-ही-साथ ॥३४॥ भर्ता चैव चरेत् कृच्छ्रं कृच्छ्रार्द्धं चैव बान्धवाः । तेषां भुक्त्वा च पीत्वा च अहोरात्रेण शुद्ध्यति ॥३५॥ उसके पति को भी एक कृच्छ्र और सम्बन्धी को आधा कृच्छ्र व्रत करना पड़ता है । यदि ऐसे व्यक्ति के घर भोजन ग्रहण किया जाय तो रात-दिन उपवास करने से शुद्धि प्राप्त होती है ॥३५॥ ब्राह्मणी तु यदा गच्छेत् परपुंसा विवर्जिता । गत्वा पुंसां शतं याति त्यजेयुस्तां तु गोत्रिणः ॥३६॥ यदि ब्राह्मण की पत्नी घर छोड़कर कहीं अकेली गमन करे और सौ पुरुषों के पास जाकर भी लौट आये तो सगोत्रियों द्वारा ऐसी स्त्री का बहिष्कार किया जाना चाहिए ॥३६॥ पुंसो यदि गृहे गच्छेत्तदशुद्धं गृहं भवेत् । पति-मातृगृहं यच्च जारस्यैव तु तद्गृहम् ॥३७॥ यदि ऐसी स्त्री अपने पति के घर वापस आ जाय तो उसके पति का घर अशुद्ध हो जाता है । पतिगृह या पितृगृह में जाने पर भी वह घर उसके प्रेमी का ही माना जाता है ॥३७॥ उल्लिख्य तद्गृहं पश्चात् पञ्चगव्येन ¹शोधयेत् । त्यजेच्च मृण्मयं पात्रं वस्त्रं काष्ठं च शोधयेत् ॥३८॥ ऐसे घर की शुद्धि के लिए उसकी भूमि की मिट्टी को कुछ खुरच- कर पञ्चगव्य द्वारा लेपन करे । घर में व्यवहृत होनेवाले मिट्टी के पात्रों को हटा दे, वस्त्र तथा काष्ठ को जल से धोकर शुद्ध कर ले ॥३८॥ सम्भाराञ्शोधयेत् सर्वान् गोवालैश्च फलोद्भवान् । ताम्राणि पञ्चगव्येन कांस्यानि दश भस्मभिः ॥३९॥ १. 'सेचयेत्' इति ।
प्रायश्चित्तं चरेद् विप्रो ब्राह्मणैरुपपादितम्¹।
CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता १११ घर में काम आनेवाली और सभी चीजों को शुद्ध कर ले अर्थात् फल से निर्मित वस्तुओं को गोबालों से, ताँबे के पात्र को पंचगव्य से और काँसे आदि के बरतनों को दस बार भस्म लगाकर मलना चाहिए॥३९॥ प्रायश्चित्तं चरेद् विप्रो ब्राह्मणैरुपपादितम्¹। गोद्वयं दक्षिणां दद्यात् प्राजापत्यद्वयं चरेत् ॥४०॥ ब्राह्मण जाति के लोगों को अन्य ब्राह्मणों के कथनानुसार प्रायश्चित्त करना उचित है। दो प्राजापत्य व्रत करने के पश्चात् दक्षिणा में ब्राह्मण को दो गायों का दान करना चाहिए ॥४०॥ इतरेषामहोरात्रं पञ्चगव्येन शोधनम्। उपवासैर्व्रतैः पुण्यैः स्नान-सन्ध्या-ऽर्चनादिभिः॥४१॥ ब्राह्मण के अतिरिक्त अन्य वर्ण के लोग तो एक दिन-रात उपवास करके पंचगव्य द्वारा शुद्धि पा लेते हैं। उपवास, व्रत, पुण्य, स्नान, सन्ध्योपासन और देवपूजन आदि ॥४१॥ जप-होम-दया-दानैः शुद्ध्यन्ते ब्राह्मणादयः। आकाशं वायुरग्निश्च मेध्यं भूमिगतं जलम् ॥४२॥ जप, हवन, दया और दान द्वारा ब्राह्मण वर्ण के व्यक्ति शुद्ध हो जाते हैं। आकाश, वायु, अग्नि, पृथ्वी पर गिरा हुआ शुद्ध और स्वच्छ जल ॥४२॥ न मेदुष्यन्ति² दर्भाश्च यज्ञेषु चमसा यथा॥४३॥ इति पाराशरीये धर्मशास्त्रे दशमोऽध्यायः॥१०॥ और कुशा कभी दूषित नहीं होता। जिस प्रकार यज्ञ का चमस पात्र (हव्य पात्र) कभी अशुद्ध नहीं होता उसी प्रकार ये भी सर्वदा शुद्ध माने गये हैं ॥४३॥ इस प्रकार पण्डित शिवदत्तमिश्रशास्त्रिकृत 'शिवदत्ती' हिन्दीटीका में पाराशरप्रोक्त धर्मशास्त्र में दसवाँ अध्याय समाप्त ॥१०॥ १. 'रुपपादयेत्' इति। २. 'दुष्यन्ति च' इति। Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal
११२ पाराशरस्मृतिः [ एकादशो- ११. एकादशोऽध्यायः अमेध्य-रेतो गोमांसं चाण्डालान्नंमथापि वा । यदि भुक्तं तु विप्रेण कृच्छ्रं चान्द्रायणं चरेत् ॥ १ ॥ जो ब्राह्मण अपनी इच्छा से किसी प्रकार का अग्राह्य पदार्थ, जैसे— मानव-अस्थि, विष्ठा, मूत्र, वीर्य, रज, शव आदि का भक्षण कर ले अथवा गोमांस या चाण्डाल का अन्न ग्रहण करे, तो उसे शुद्धि के निमित्त चान्द्रायण व्रत करना उचित है । और यदि उपर्युक्त वस्तुएँ किसी के द्वारा बलात् या अनिच्छापूर्वक ग्रहण की गयी हों तो ऐसी अवस्था में कृच्छ्रव्रत करना चाहिए ॥ १ ॥ तथैव क्षत्रियो वैश्योऽप्यर्द्ध चान्द्रायणं चरेत् । शूद्रोऽप्येवं यदा भुङ्क्ते प्राजापत्यं समाचरेत् ॥ २ ॥ यदि क्षत्रिय या वैश्य कथित वस्तुओं का भक्षण कर ले तो उसे अर्ध-चान्द्रायण व्रत करना पड़ता है । शूद्र के द्वारा ग्रहण किये जाने पर प्राजापत्य नामक व्रत करना उचित है ॥ २ ॥ पञ्चगव्यं पिबेच्छूद्रो ब्रह्मकूर्चं पिबेद् द्विजः । एक-द्वि-त्रि-चतुर्गा वा सद्याद् विप्राद्यनुक्रमात् ॥ ३ ॥ व्रतकाल में शूद्र को पञ्चगव्य और ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य—इन तीनों वर्णों को ब्रह्मकूर्च का पान करके क्रमशः एक, दो, तीन और चार गायों का दान करने का विधान कहा गया है ॥ ३ ॥ शूद्रान्नं सूतकान्नं च अभोज्यस्याऽन्नमेव च । शङ्कितं प्रतिषिद्धान्नं पूर्वोच्छिष्टं तथैव च ॥ ४ ॥ शूद्र का अन्न, सूतक का अन्न, ग्रहण के समय का अन्न, भक्षण के अयोग्य मनुष्य का अन्न, सन्दिग्ध अन्न अर्थात् जिसके ग्राह्य-अग्राह्य का निर्णय न हो सके, निषिद्ध अन्न और किसी के भक्षण के पश्चात् बचा हुआ जूठा अन्न, ॥ ४ ॥ Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal
ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता ११३, यदि भुक्तं तु विप्रेण अज्ञानादापदाऽपि वा । ज्ञात्वा समाचरेत् कृच्छ्रं ब्रह्मकूर्चं तु पावनम् ॥ ५ ॥ जो ब्राह्मण संकट काल में या अनजान में भक्षण कर ले और बाद में उसकी यथार्थता का बोध होने पर उस ब्राह्मण के लिए कृच्छ्र व्रत और ब्रह्मकूर्च का पान शुद्धि के साधन माने गये हैं ॥५॥ बालैर्नकुल-मार्जारैरन्नमुच्छिष्टितं१ यदा । तिल-दर्भोंदकैः प्रोक्ष्य शुद्धयते नाऽत्र संशयः ॥ ६ ॥ जिस परिपक्व अन्न को किसी बालक, नेवले या बिलाव ने जूठा कर दिया हो तो ऐसे अन्न पर तिल और कुशा का जल छिड़कने मात्र से ही वह अन्न पवित्र हो जाता है ॥६॥ शूद्रोऽप्यभोज्यं भुक्त्वाऽन्नं पञ्चगव्येन शुद्ध्यति । क्षत्रियो वाऽपि वैश्यश्च प्राजापत्येन शुद्ध्यति ॥ ७ ॥ यदि किसी शूद्र ने अभोज्य पदार्थ का भक्षण किया हो तो उसके लिए पंचगव्य का पान और ऐसी ही अवस्था के क्षत्रिय या वैश्य के लिए प्राजापत्य व्रत करने का विधान है ॥७॥ एकपङ्क्त्युपविष्टानां विप्राणां सहभोजने । यद्येकोऽपि त्यजेत् पात्रं शेषमन्नं न भोजयेत् ॥ ८ ॥ ब्राह्मणों की मण्डली की कतार में बैठकर भोजन करनेवाला कोई व्यक्ति यदि भोजन छोड़कर उठ जाय तो उस कतार के सभी ब्राह्मणों को भोजन का परित्याग कर देना चाहिए । क्योंकि इसके बाद किया जानेवाला भोजन जूठा माना जाता है ॥८॥ मोहाद् भुञ्जीत यस्तत्र पङ्क्तावुच्छिष्टभोजने । प्रायश्चित्तं चरेद् विप्रः कृच्छ्रं सान्तपनं तथा ॥ ९ ॥ १. '-मुच्छेषितं' इति । २. 'तदा' इति । ८
११४ पाराशरस्मृतिः [ एकादशो- यदि मोहवश कोई ब्राह्मण उस जूठी पंक्ति में भोजन कर ही ले तो कृच्छ्र-सान्तपन व्रत करने से उसका प्रायश्चित्त दूर हो जाता है ॥९॥ पीयूषं श्वेत - लशुनं वृन्ताकफल - गृञ्जने । पलाण्डुं ¹वृक्षनिर्यास देवस्वं कवकानि च ॥१०॥ यदि कोई ब्राह्मण अपनी अज्ञानता के कारण तुरन्त की ब्यायी हुई गौ का दूध, सफेद लहसुन, सफेद रंग का बैगन, गाजर, प्याज, गोंद, देवसमर्पित वस्तु, कुकुरमुत्ता, ॥१०॥ उष्ट्रीक्षीरमविक्षीरमज्ञानाद् भुञ्जते² द्विजः³ । त्रिरात्रमुपवासेन पञ्चगव्येन शुद्धयति ॥११॥ ऊँटनी का दूध या भेड़ी का दूध पान कर ले तो उसे तीन दिन उपवास करके पंचगव्य पान करना आवश्यक है ॥११॥ मण्डूकं भक्षयित्वा तु मूषिकामांसमेव च । ज्ञात्वा विप्रस्त्वहोरात्रं यवकान्नेन शुद्धयति ॥१२॥ यदि कोई जान-बूझकर मेढक या चूहे का मांस भक्षण करे तो उसे शुद्धि के निमित्त एक दिन जव का बनाया हुआ भात खाना चाहिए ॥१२॥ क्षत्रियश्चाऽपि वैश्यश्च क्रियावन्तौ शुचिव्रतौ । तद्गृहे⁴ तु द्विजैर्भोज्यं हव्य-कव्येषु नित्यशः ॥१३॥ अपने धर्म में तत्पर सदाचारी क्षत्रिय या वैश्य के घर देवता या पितृ कार्य में आमन्त्रित ब्राह्मण को निःसंकोच भोजन करना चाहिए ॥१३॥ ⁵घृतं तैलं तथा क्षीरं गुडं स्नेहेन पाचितम् । १. 'वृक्षनिर्यासान्' 'पलाण्डुवृक्षनिर्यासान् देवस्वकवनानि च' इति च । २. 'पिबते' इति । ३. 'द्विजाः' इति । ४. 'तद्गृहेषु' इति । ५. 'घृतं क्षीरं तथा तैलं गूढं तैलेन पाचितम्' इत्यपि पाठः क्वचित्पुस्तके दृश्यते ।
ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता ११५ गत्वा नदीतटे विप्रो भुञ्जीयाच्छूद्रभोजनम्¹ ॥१४॥ ब्राह्मण को शूद्र के घर का दूध, गुड़, तेल तथा घृतनिर्मित पदार्थ किसी जलाशय या नदी के तट पर ले जाकर भक्षण करना चाहिए, परन्तु उसके घर में बैठकर भोजन नहीं करना चाहिए ॥१४॥ मद्य-मांसरतं नित्यं नीचकर्म-प्रवर्तकम् । तं शूद्रं वर्जयेद् विप्रःश्वपाकमिव दूरतः ॥१५॥ मद्य-मांस का क्रय-विक्रय या चर्मच्छेदन आदि निषिद्ध कर्म करने- वाले शूद्र का ब्राह्मण द्वारा परित्याग किया जाना चाहिए ॥१५॥ द्विज-शुश्रूषणरतान् मद्य-मांस-विवर्जितान् । स्वकर्मणि² रतान्नित्यं न ताँ³ञ्छूद्रान् त्यजेद् द्विजः ॥१६॥ विप्रसेवी, मद्य-मांस से रहित और अपने कर्म में निरत रहनेवाले शूद्र का ब्राह्मण को परित्याग नहीं करना चाहिए ॥१६॥ अज्ञानाद् भुञ्जते विप्राः सूतके मृतकेऽपि वा । प्रायश्चित्तं कथं⁴ तेषां वर्णे वर्णे विनिर्दिशेत् ॥१७॥ सूतक या मृतक के घर में अनजाने ही यदि कोई ब्राह्मण भोजन कर ले तो उस ब्राह्मण को विभिन्न वर्णों के घर में भोजन करने का अलग-अलग ढंग से प्रायश्चित्त करना पड़ता है ॥१७॥ गायत्र्यष्टसहस्रेण शुद्धिः स्याच्छूद्रसूतके । वैश्ये पञ्चसहस्रेण त्रिसहस्रेण क्षत्रिये ॥१८॥ सूतक में शूद्र के घर भोजन करने से आठ हजार, वैश्य के घर भोजन करने से पाँच हजार और क्षत्रिय के घर भोजन करने पर तीन हजार गायत्री मन्त्र जप करने से उस ब्राह्मण का दोष दूर हो जाता है ॥१८॥ १. 'च्छूद्रभाजने' इति । 'स्वकर्मनिरतान्नित्यं' इति । ३. 'तान् शूद्रान्' इति । ४. 'तत्र' इति । Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal
CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri ११६ पराशरस्मृतिः [ एकादशो- ब्राह्मणस्य यदा भुङ्क्ते १द्वे सहस्रे तु दापयेत् । अथवा वामदेव्येन २साम्नैवैकेन शुद्ध्यति ॥१९॥ किसी ब्राह्मण के घर सूतक में भोजन करने से दो हजार गायत्री का जाप अथवा 'वामदेव्य' साम अर्थात् 'कया नश्चित्र०' से लेकर तीन मन्त्र का एक पाठ कर लेने से ही शुद्धि हो जाती है ॥१९॥ शुष्कान्नं गोरसं स्नेहं शूद्रवेश्मन ३आहृतम् । पक्वं विप्रगृहे ४भुक्तं भोज्यं तन्मनुरब्रवीत् ॥२०॥ शूद्र के घर का सूखा अन्न, गाय का दूध और घी, तेल आदि ब्राह्मण के घर में पकाकर भक्षण के योग्य होता है। ऐसा मनुजी ने आदेश दिया है ॥२०॥ औपत्कालेषु विप्रेण भुक्तं शूद्रगृहे यदि । मनस्तापेन शुद्ध्येत ६द्रुपदां वा ७जपेच्छतम् ॥२१॥ यदि कोई ब्राह्मण विपत्तिकाल में शूद्र के घर का बना हुआ भोजन कर ले तो मन में पश्चात्ताप कर लेने मात्र से ही उसकी शुद्धि हो जाती है अथवा सौ बार 'द्रुपदादिव०' मन्त्र का पाठ करने से दोष नष्ट हो जाता है ॥२१॥ दास - नापित-गोपाल - कुलमित्राऽर्द्धसीरिणः । एते शूद्रेषु भोज्यान्ना यश्चाऽऽत्मानं निवेदयेत् ॥२२॥ दास, नापित, गोपाल, अपने वंश का मित्र, अर्धसीरी तथा आत्म- समर्पणकारी शूद्र का अन्न भक्षणीय कहा जाता है ॥२२॥ १. 'द्विसहस्रं तु' इति । २. 'साम्ना चैकेन' इति । ३. 'शूद्रवेषेण' इति । ४. 'भुक्ते' इति । ५. 'आपत्काले तु' इति । ६. 'ॐ द्रुपदादिव मुमुचानः स्विन्नः स्नातो मलादिव । पूतं पवित्रेणेवाज्यमापः शुन्धन्तु मैनसः ।' ७. 'शतं जपेत्' इति । ८. 'विधीयते' इति । Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal
ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता ११७ शूद्रकन्यासमुत्पन्नो ब्राह्मणेन तु संस्कृतः । असंस्काराद् भवेद्दासः संस्कारादेव नापितः ॥२३॥ ब्राह्मण द्वारा शूद्र कन्या से उत्पन्न सन्तान का संस्कार कर देने से वह 'नापित' हो जाता है, और संस्कार-विहीन सन्तान 'दास' कहलाता है ॥२३॥ क्षत्रियाच्छूद्रकन्यायां समुत्पन्नस्तु यः सुतः । स गोपाल इति ख्यातो भोज्यो विप्रैर्न संशयः ॥२४॥ क्षत्रिय द्वारा शूद्र कन्या से उत्पन्न सन्तान को 'गोपाल' कहते हैं। ऐसे व्यक्ति का अन्न ब्राह्मण को भक्षण करना उचित है ॥२४॥ वैश्यकन्यासमुद्भूतो ब्राह्मणेन तु संस्कृतः । १सो हर्धाद्धिक इति ज्ञेयो भोज्यो विप्रैर्न संशयः ॥२५॥ ब्राह्मण द्वारा वैश्य कन्या में उत्पन्न सन्तान का संस्कार कर देने से वह सन्तान 'अर्धसोरी' कहलाता है। ऐसे मनुष्य का अन्न ब्राह्मणों के लिए ग्राह्य है ॥२५॥ भाण्डस्थितमभोज्येषु जलं दधि घृतं पयः । अकामतस्तु यो भुङ्क्ते प्रायश्चित्तं कथं भवेत् ? ॥२६॥ अग्राह्यों के पात्र में रखे हुए जल, दही, घी या दूध को जो अनजाने में ही ग्रहण कर ले, तो उसका प्रायश्चित्त किस प्रकार से हो सकता है ? ॥२६॥ ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यः शूद्रो वा उपसर्पति । ब्रह्मकूर्चोपवासेन ३योज्या वर्णस्य निष्कृतिः ॥२७॥ १. 'संस्कृतस्तु भवेद्दासो ह्यसंस्कारैस्तु नापितः' इति । 'संस्कारात्तु भवेद्दासः असंस्काराच्च नापितः' इति च पाठा० । २. 'सोत्यर्द्धिक' इति । ३. 'याज्यवर्णस्य' इति ।
११४ पराशरस्मृतिः [ एकादशो- चारों वर्णों में से सभी लोगों की शुद्धि ब्रह्मकूर्च के पान और उपवास करने से हो जाती है ॥२७॥ शूद्राणां नोपवासः स्याच्छूद्रो दानेन शुद्धयति । ब्रह्मकूर्चमहोरात्रं श्वपाकमपि शोधयेत् ॥२८॥ शूद्रों को उपवास करने का आदेश नहीं दिया गया है । शूद्र केवल दान करने से ही शुद्ध हो जाता है । ब्रह्मकूर्च पान करके रात-दिन रह जाने से चाण्डाल भी शुद्ध हो जाता है ॥२८॥ गोमूत्रं गोमयं क्षीरं दधि सर्पिः कुशोदकम् । निर्दिष्टं पञ्चगव्यं तु१ पवित्रं पापशोधनम् ॥२९॥ पंचगव्य बनाने के लिए गाय का गोबर, गोमूत्र, दूध, दही, घी और कुश के जल का मिश्रण किया जाता है । इसका मिश्रण समस्त पापों का नाशक और अत्यन्त पवित्र कहा गया है ॥२९॥ गोमूत्रं कृष्णवर्णायाः श्वेतायाश्चैव गोमयम् । पयश्च ताम्रवर्णाया रक्ताया गृह्यते दधि ॥३०॥ काली गाय का मूत्र, सफेद गाय का गोबर, ताम्रवर्णी गौ का दूध और लाल रंग की गाय का दही, ॥३०॥ कपिलायाः घृतं ग्राह्य सर्वं कौपिलमेव२ वा । मूत्रमेकपलं दद्यादङ्गुष्ठार्द्धं तु गोमयम् ॥३१॥ कपिला गाय का घृत अथवा उपर्युक्त वर्णित सभी वस्तुएँ कपिला गाय का ही हो । गोमूत्र ४ तोला, आधे अँगूठे के बराबर गोबर, ॥३१॥ क्षीरं सप्तपलं दद्याद् दधि त्रिपलमुच्यते । घृतमेकपलं दद्यात् पलमेकं कुशोदकम् ॥३२॥ दूध २८ तोले, दही १२ तोले, घी ४ तोले और कुशा का जल ४ तोले लेना चाहिए । ३२॥
१. 'च' इति । २. 'कपिल' इति ।
CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता ११९ 'गायत्र्याऽऽदाय गोमूत्रं गन्धद्वारेति गोमयम् । आँप्यायस्वेति च क्षीरं दधिक्राव्णस्तथा दधि ॥३३॥ गोमूत्र ग्रहण के समय 'ॐ भूर्भुवः स्वः०' गायत्रीमंत्र का पाठ, 'गन्धद्वारां०' मन्त्र से गोबर, 'आप्यायस्व०' मन्त्र से दूध और 'दधि- क्रा०णो०' मन्त्र से दही ग्रहण करना चाहिए ॥३३॥ तेजोऽसि शुक्रमित्याज्यं देवस्य त्वा कुशोदकम् । पञ्चगव्यमृचा पूतं स्थापयेदग्निसन्निधौ । ३४॥ 'तेजोऽसि शुक्रम्०' मन्त्र से घृत और 'देवस्य त्वा०' मन्त्र से कुशोदक ग्रहण करे। उक्त ऋचाओं से शुद्ध किया हुआ पंचगव्य अग्नि के समक्ष स्थापित करना चाहिए ॥३४॥ आँपो हिष्ठेति चाऽलोड्य मा नस्तोकेति मन्थयेत् । सप्त वारांस्तु ये दर्भा अच्छिन्नाग्राः शुकत्विषः ॥३५॥ 'आपो हिष्ठा०' मन्त्र द्वारा उसे हिलोदना और 'मा नस्तोके०' मन्त्र से मंथन किया जाना चाहिए। इसके पश्चात् सात बार अर्थात् १. ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ॥ २. गन्धद्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम् । ईश्वरीं सर्वभूतानां तामिहोपह्वये श्रियम् ॥ ३. आप्यायस्व समेतु ते विश्वतः सोम वृष्ण्यम् । भवा वाजस्य सङ्गथे ॥ — ऋ० मं० ९, सूक्त ३१, मन्त्र० ४ ४. दधिक्राव्णो अकारिषं जिष्णोरश्वस्य वाजिनः । सुरभि नो मुखा करतप्राण आयूंषि तारिषत् ॥ —ऋ० ४,३९,६ ५. तेजोऽसि शुक्रममृतमायुष्पा आयुर्मे पाहि । ६. देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेऽश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्यामाददे ॥ —शु० य० सं०, अ० २२, म० १ ७. आपो हिष्ठा मयोभुवस्ता न ऊर्जे दधातन । महे रणाय चक्षसे ॥ ऋ. १०,९,१ ८. मा नस्तोके तनये मा न आयौ मा नो गोषु मा नो अश्वेषु रीरिषः । वीरान्मा नो रुद्रभामितो वधीर्हविष्मन्तः सदमित्त्वा हवामहे ॥—ऋ. १,११४,८ Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal