पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation
महर्षि पराशर द्वारा
स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 119, कुल 170 में से
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शङ्खपुष्पीलतामूलं पत्रं वा कुसुमं फलम् ॥२१॥ इसके बाद तीन दिन तक उपवास करके एक दिन-रात जल में खड़ा रहे। फिर सातवें दिन शंखपुष्पी नामक लता के पंचांग (फल, फूल, मूल, पत्ती आदि) में से किसी एक को लेकर ॥२१॥ सुवर्णं १पञ्चगव्यं च क्वाथयित्वा पिबेज्जलम् । एकभक्तं चरेत् पश्चाद्यावत् पुष्पवती भवेत् ॥२२॥ इसके साथ सोना और पंचगव्य मिला ले। फिर उपर्युक्त वस्तुओं को जल में उबालकर उसका काढ़ा तैयार करे और उस काढ़े का पान करे। जब तक पुनः रजस्वला न हो तब तक नियमपूर्वक इस एकभक्त व्रत को करती रहे ॥२२॥ व्रतं चरति तद्यावत्तावत् संवसते बहिः । प्रायश्चित्ते ततश्चीर्णे कुर्याद् ब्राह्मणभोजनम् ॥२३॥ व्रतकाल में घर के बाहर ही निवास करे और प्रायश्चित्त पूरा करके ब्राह्मण को भोजन कराना चाहिए ॥२३॥ गोद्वयं दक्षिणां दद्याच्छुद्धिं पाराशरोऽब्रवीत् । चातुर्वर्ण्यस्य नारीणां कृच्छ्रं चान्द्रायणं स्मृतम् ॥२४॥ तत्पश्चात् दक्षिणास्वरूप ब्राह्मण को दो गायें प्रदान करनी चाहिए। ऐसा महर्षि पाराशर का मत है। यदि स्वेच्छा से चारों वर्ण की स्त्रियाँ चाण्डाल से सहवास करें तो एक कृच्छ्र और एक चान्द्रायण व्रत करने से उनकी शुद्धि हो जाती है ॥२४॥
१. पलमात्रं दुग्धभागं गोमूत्रं तावदिष्यते । घृतं च पलमात्रं स्याद् गोमयं तोलकद्वयम् ॥ दधिप्रसृतमात्रं स्यात् पञ्चगव्यमिदं स्मृतम् । अथवा पञ्चगव्यानां समानो भाग इष्यते ।' योषशकृद् द्विगुणं मूत्रं पयः स्यात्तच्चतुर्गुणम् । घृतं तद् द्विगुणं प्रोक्तं पञ्चगव्ये तथा दधि ॥—गौतमीतन्त्रे