भारतकोश
पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation

महर्षि पराशर द्वारा

स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished170 पृष्ठ

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ऽध्याय ] भाषाटीकासहिता १०१ तत्पापं तस्य तिष्ठेत १वक्ता च नरकं व्रजेत् । यत्किञ्चित् क्रियते पापं सर्वं केशेषु तिष्ठति ॥५५॥ तो वह स्वयं पातकी होता है और बतलानेवाला नरकगामी होता है, क्योंकि सभी प्रकार के किये हुए पाप केशों में विद्यमान रहते हैं ॥५५॥ सर्वान् केशान् समुद्धृत्य छेदयेदङ्गुलद्वयम् । एवं नारी-कुमारीणां शिरसो मुण्डनं स्मृतम् ॥५६॥ विवाहिता अथवा अविवाहिता स्त्री के मुण्डन में केश के ऊपरी सिरे को पकड़कर दो-दो अंगुल बाल काट लेना चाहिए ॥५६॥ न स्त्रियाः केशवपनं न दूरे शयनाऽऽसनम् । न च गोष्ठे वसेद् रात्रौ न दिवा गा अनुव्रजेत् ॥५७॥ स्त्रियों के समस्त केशों को मूंडना, अलग होकर सोना, बैठना, गोशाले में रहकर रात बिताना और दिन में गायों के झुण्ड के पीछे- पीछे घूमना—ये सब कार्य वर्जित होते हैं। ५७॥ नदीषु सङ्गमे चैव अरण्येषु विशेषतः । न स्त्रीणामजिनं वासो व्रतमेवं समाचरेत् ॥५८॥ नदियों के संगमस्थान, विशेषतः वनों में वास तथा मृगछाला आदि को धारण न कराकर व्रत का अनुष्ठान कराना चाहिए ॥५८॥ त्रिसन्ध्यं स्नानमित्युक्तं सुराणामर्चनं तथा । बन्धुमध्ये व्रतं तासां कृच्छ्र-चान्द्रायणादिकम् ॥५९॥ त्रिकाल स्नान, देवताओं की अर्चना और अपने बन्धुवर्गों में निवास करना ही स्त्रियों का कृच्छ्र-चान्द्रायण व्रत माना गया है ॥५९॥ गृहेषु सततं तिष्ठेच्छुचिर्नियममाचरेत् । इह यो गोवधं कृत्वा प्रच्छादयितुमिच्छति ॥६०॥ १. 'त्यक्त्वा' इति पा० । २. 'शयनाऽशनम्' इति ।