भारतकोश
परिभाषेन्दुशेखर (नागेश भट्ट - व्याकरण परिभाषा सिद्धान्त एवं भैरवी टीका सटीक)

परिभाषेन्दुशेखर (नागेश भट्ट - व्याकरण परिभाषा सिद्धान्त एवं भैरवी टीका सटीक)

Paribhashendushekhara of Nagesha Bhatta with Commentary

महामहोपाध्याय नागेश भट्ट (सम्पादक: पं. विश्वनाथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished373 पृष्ठ

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मानत्वम्, तद्घटितत्वेन च जराशब्द-पाशब्दयोस्तत्त्वम् । 'सजूस्सजूर्भ्यामि'त्यत्र पूर्व-सजुष्शब्दे तदवयव-षस्य स्वप्रयोज्योपस्थितिविषयपूर्वत्वेऽपि द्वितीयसम्बन्धाभावेन तद्विशिष्टोदासीनवर्णघटितत्वात्तत्त्वसिद्धिः ।" LOOK AT THAT! "द्वितीयसम्बन्धाभावेन"! And in L21: "'जरसावि'त्यत्र जकारे द्वितीयसम्बन्धसत्त्वेऽप्याद्यसम्बन्धाभावान्नातिव्याप्तिः ।" In जरसौ: on जकार, there IS the द्वितीयसम्बन्ध, but NOT the आद्यसम्बन्ध! Why does जकार have द्वितीयसम्बन्ध? Because जकार is an अवयव of जरा! Wait, what relation does जकार have to जरा? जकार is a constituent of जरा! And what about रेफ in निर्जरसौ? Is रेफ an अवयव of जरा? NO! Wait! "षष्ठीप्रकृतिविशिष्टो वर्णो निर्शब्दावयव-रेफः"?? Wait, does it say निर्शब्दावयव-रेफः? Let's re-read L17: "'निर्जरसावि'त्यत्र निरुक्तोभयसम्बन्धेन षष्ठीप्रकृतिविशिष्ट