भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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१५० फलदीपिका

शत्रु स्थान है। पाप ग्रह शत्रुओं का नाश करेगा इसलिये उत्तम है। यह भी प्रसिद्ध उक्ति है कि ३, ६, ११ इन स्थानों में मंगल, शनि, राहु हो तो उत्तम हैं। इसका भी आशय यही है कि पाप ग्रह छठे में रहकर शत्रु और रोग को नष्ट करेगा। अब मन्त्रेश्वर महाराज का मत लीजिये। वे इस सिद्धान्त को पकड़ते हैं कि किसी भाव का सुख तभी प्राप्त होता है जब भावेश बलवान् हो—पहली बात। इसमें तो किसी को आपत्ति हो ही नहीं सकती। किन्तु दुःस्थान का स्वामी किसी दुःस्थान में बैठे तो भी अच्छा ही माना जाता है यह बात फलदीपिका में भी आगे इसी अध्याय के ५७वें श्लोक में बताई गई है। वह देखिये। दूसरी बात यह है कि शुभ ग्रह जहाँ बैठे हों उस भाव के सुख को बढ़ावेंगे। इसी प्रकार शुभ ग्रह जिस भाव को देखते हों उस भाव सम्बन्धी फल में भलाई पैदा करेंगे। पंडित जवाहरलाल नेहरू की जन्म कुण्डली में (देखिये पृष्ठ १२१) छठे स्थान में बृहस्पति और केतु हैं; शनि इस भाव को आधी दृष्टि से देखता है मंगल पूर्ण दृष्टि से और शुक्र व बुध चौथाई दृष्टि से देखते हैं इसलिये शुभाशुभ दोनों दृष्टियों के होने के कारण तथा शुभ ग्रह बृहस्पति एवं पाप ग्रह केतु दोनों के छठे घर में बैठने के कारण पूर्ण रूप से अस्त्र योग घटित नहीं होता किन्तु षष्ठेश का मालिक बलवान् होकर अपने घर में बैठा है इस कारण हम तो 'अस्त्र' योग मानेंगे। अब पाठक स्वयं देखे कि यह योग उनमें कहां तक घटित होता है। मन्त्रेश्वर महाराज ने अस्त्र योग का निम्नलिखित फल कहा है:— जो अस्त्र योग में पैदा होता है वह बड़े बड़े बलवान् शत्रुओं को अपनी जबर्दस्त ताकत से दबा देता है। बहुत क्रूर प्रवृत्ति वाला अभि- मानी होता है। ऐसे व्यक्ति के शरीर के अवयव दृढ़ (मजबूत) होते हैं; किन्तु शरीर में व्रण के चिह्न भी होते हैं। अस्त्र योग में उत्पन्न व्यक्ति विवादकारी होता है। पंडित जी बहस मुबाहिसा में कितने बढे हुए थे और उनकी तकरीर कैसी होती थी यह पाठक स्वयं विचार कर लें।