फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंछठा अध्याय : योग १५१ (७) यदि सप्तम स्थान पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो और सप्तम स्थान में शुभ ग्रह बैठे हों एवं सप्तम स्थान का स्वामी स्वराशि या उच्चराशि का होकर उत्तम स्थान पर बैठा हो तो “काम” योग होता है। सप्तमेश अस्त नहीं होना चाहिए। जो व्यक्ति काम योग में उत्पन्न होते हैं वे लोग परदार पराङ्मुख होते हैं अर्थात् व्यभिचारी नहीं होते। ऐसे व्यक्ति को उत्तम स्त्री, सन्तान और बन्धुओं का सुख प्राप्त होता है। ऐसा आदमी अपने शुभ गुणों से बहुत लक्ष्मी प्राप्त करता है और अपने पिता से अधिक उच्च पदवी प्राप्त करता है। (८) यदि अष्टम स्थान में शुभ ग्रह हों या शुभ ग्रह इस स्थान को देखते हों और अष्टमेश स्वराशि, उच्चराशि का अस्तंगत न होकर उत्तम स्थान में बैठा हो तो आसुर योग होता है। इसका फल निकृष्ट है। ऐसा आदमी स्वार्थी कुकर्मी, दरिद्री, दुराग्रही (बुरी तरह ज़िद करने वाला) चुगलखोर और दूसरों का काम बिगाड़ने वाला होता है। अपने किये हुये दुष्ट कार्यों के परिणाम स्वरूप ऐसा मनुष्य स्वयं हानि और दुःख उठाता है। (९) यदि नवम भाव में शुभ ग्रह बैठे हों, नवम भाव को शुभ ग्रह देखते हों, नवम भाव का स्वामी सूर्य किरणों के सान्निध्य से अस्तंगत न होकर अपनी राशि या अपनी उच्चराशि में स्थित होता हुआ उत्तम स्थान में बलवान् बैठा हो तो 'भाग्य' योग होता है। ऐसा व्यक्ति जब पालकी में जाता है तो उसके दोनों ओर चंवर रहते हैं और उसके साथ-साथ आगे पीछे बाजे बजते हुये चलते हैं। प्राचीन समय में इस
- श्लोक ४४ से ५६ तक जो योग बनाये गये हैं उनमें यह स्मरण रखना चाहिये कि जिस भावेश का विचार कर रहे हों वह अस्त नहीं होना चाहिये । अस्त होने से उस ग्रह की किरणें—सूर्य की किरणों से मिश्रण हो जाने से जल जाती हैं, इस कारण उसका सब प्रभाव नष्ट हो जाता है, कमजोर ग्रह पूर्ण शुभ प्रभाव उत्पन्न नहीं कर सकता ।