फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५२ फलदीपिका प्रकार की सवारी प्राप्त होना—चंवर पालकी और बाजों के साथ, परम ऐश्वर्य समझा जाता था। ऐसे आदमी को सदैव रहने वाली लक्ष्मी प्राप्त होती है अर्थात् सदैव पूर्ण धनी रहता है । बड़े बड़े आदमी ऐसे व्यक्ति को नमस्कार करते हैं । यह अपने माता पिता का, पितरों, ब्राह्मणों, और देवताओं का पूजन कर सदैव उनको प्रसन्न रखता है। भाग्य योग में उत्पन्न व्यक्ति अपने कुल की कीर्ति को बढ़ाने वाला, आचारनिष्ठ, सहृदय होता है। नवम में शुभ ग्रह होने से शुभ हृदय वाला और पाप ग्रह होने से कुकर्म वृत्ति वाला मनुष्य होता है। नवम पर शुभाशुभ दृष्टि का भी यही अर्थ समझना चाहिये । (१०) यदि दशम भाव में शुभ ग्रह बैठे हों और दशम भाव को शुभ ग्रह देखते हों तथा दशम का मालिक अस्त न होकर उत्तम स्थान में बैठकर अपनी उच्चराशि या स्वराशि में स्थित हो तो ख्याति योग होता है। जो इस योग में उत्पन्न हो वह उत्तम कर्म करता है और उसके कार्य की सब प्रशंसा करते हैं। ऐसा व्यक्ति नृप होकर अपनी प्रजा की अच्छी रक्षा करता है; और लोक में ख्याति प्राप्त करता है। ऐसे जातक को स्त्री, पुत्र, मित्र और धन का पूर्ण सुख प्राप्त होता है और भाग्यवान् होता है । (११) यदि लाभेश अस्त न होकर अपनी स्वयं की राशि या उच्चराशि में स्थित होकर लग्न से उत्तम स्थान बैठा हो और लाभ
- ऊपर के बारहवों योगों में भाव विवेचन करते समय बारंबार यह आया है:—शुभ ग्रहों की भाव पर दृष्टि हो और भाव शुभ ग्रहों से युत हो । शुक्ल पक्ष का चन्द्रमा मिलाकर और शुभ ग्रहों सहित बुध को भी लेते हुये कुल चार शुभ ग्रह हुये और यह साधारणतः सम्भव नहीं कि दो बैठे हों और दो देखते हों इसलिये अर्थ यह समझना चाहिये कि पाप ग्रह बैठा न हो, शुभ ग्रह बैठा हो । पाप ग्रह देखता न हो, शुभ ग्रह देखता हो ।