फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंछठा अध्याय : योग १५३ स्थान में शुभ ग्रह बैठे हों या इस स्थान (एकादश) को शुभ ग्रह देखते हों तो सुपारिजात योग होता है। जो इस योग में उत्पन्न होता है वह अच्छे कुटुम्ब वाला, अर्थ संग्रह करने से धनी, नित्य मंगल (शुभ) कार्यों में भाग लेने वाला, पुण्य कथाओं के सुनने में तथा भक्ति में समय लगाने वाला, विद्वान् और सत्कर्म करने वाला होता है। (१२) यदि बारहवें घर में शुभ ग्रह बैठे हों या इस घर को शुभ ग्रह देखते हों और इस घर का मालिक स्वराशि या उच्चराशि में स्थित होकर लग्न से उत्तम स्थान में बैठा हो तो मुसल योग होता है जो मुसल योग में उत्पन्न होता है उसको बड़ी कठिनता से धन प्राप्ति होती है। उसकी सम्पत्ति चंचल होती है अर्थात् कभी धन रहता है और कभी नहीं रहता। ऐसा व्यक्ति बहुत व्यय करने वाला होता है परन्तु वाजिब काम में ही खर्च करता है। ऐसे व्यक्ति को अन्य लोग (शत्रु) दबा लेते हैं । मुसलयोग में उत्पन्न व्यक्ति चपल और मूर्ख होता है किन्तु उसे जीवन के अन्त में स्वर्ग प्राप्ति होती है। लग्न से १२ भाव पर्यन्त यदि प्रत्येक शुभ ग्रह से युत वेक्षित हो और भावेश उच्चराशि या स्वराशि में स्थित होकर लग्न से उत्तम स्थान में बैठा हो तो क्रमशः १२ योग होते हैं और उनके पृथक्-पृथक् क्या-क्या फल होते हैं यह ऊपर बताया गया है। अब अन्य १२ योग बताते हैं । दुःस्थैर्भावगृहेश्वरैरशुभसंयुक्तेक्षितैर्वा क्रमा- द्भा वैः स्युस्त्ववयोगनिःस्वमृतयः प्रोक्ताः कुहूः पामरः । हर्षो दुष्कृतिरित्यथापि सरलो निर्भाग्यदुर्यौगकौ योगा द्वादश ते दरिद्रविमले प्रोक्ता विपश्चिज्जनैः ॥५७॥ अप्रसिद्धिरतिदुःसहदैन्यं स्वल्पमायुरवमानमसद्भिः । संयुतः कुचरितः कुतनुः स्याच्चञ्चलस्थितिरिहाप्यवयोगे ॥५८॥