भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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२८० फलदीपिका स्थिरे स्थिरांशाधिगतः सपापः पृष्ठोदयेऽधोमुखभे च संस्थः । तदीश्वरो वृक्षलतादिजन्म स्यादन्यथा जीवयुतः शरीरी ॥२७॥ लग्नेशितुः स्वोच्चसुहृत्स्वगेहान् तदीश्वरो याति मनुष्यजन्म । समे मृगाः स्युर्विहगाः परस्मिन् द्रेष्काणरूपैरपि चिन्तनीयम् ॥२८॥ तावेकराशौ जननं स्वदेशे तौ तुल्यवीर्यौ यदि तुल्यजातौ । वर्णो गुणस्तस्य खगस्य तुल्यः संज्ञोदितैरेव वदेत्समस्तम् ॥२९॥ (क) (१) यदि बारहवें घर का मालिक अपनी उच्च राशि, मित्र की राशि में बैठा हो और सौम्य वर्ग (होरा, द्रेष्काण, सप्तमांश, नवांश, द्वादशांश, त्रिंशांश आदि) में हो या सौम्य ग्रह के साथ बैठा हो तो उसकी (मरण के बाद) ऊर्ध्वगति (ऊपर की ओर गति अर्थात् स्वर्ग की ओर) होती है। किन्तु यदि बारहवें घर का मालिक अपनी नीच राशि, शत्रु की राशि या क्रूर वर्गों में बैठा हो और क्रूर ग्रह के साथ बैठा हो तो अधोगति (नीचे की ओर अर्थात् नरक की ओर गति) होती है। (२) कुछ का विचार है कि बारहवें घर में ऊर्ध्वास्य राशि हो बारहवें घर का मालिक ऊर्ध्वास्य राशि में हो तो ऊर्ध्वगति अन्यथा अधोगति होती है। (३) कुछ अन्य का मत है कि शीर्षोदय राशि ऊर्ध्वगति कारक