फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसत्रहवां अध्याय निर्याणप्रकरण तत्तद्भावादष्टमेशस्थितांशे तत्तत्त्रिकोणगे । व्ययेशस्थितभांशे वा मन्दे तद्भावनाशनम् ॥१॥ किसी भाव सम्बन्धी नाश कब होगा यह विचार करना हो तो यह देखिये कि विचारणीय भाव से अष्टम और द्वादश के स्वामी कहाँ पर हैं । जब शनि गोचरवश वहाँ (विचारणीय भाव से गिनने पर आठवें और बारहवें के स्वामी जहाँ पर हों उस राशि और नवांश पर) आवेगा तब विचारणीय भाव का नाश होता है । ऊपर जो स्थान बताये गये हैं, जहां शनि हानि करता है वहाँ से नवम और पंचम राशियों पर आने पर भी शनि अनिष्ट करेगा । ॥१॥ उदाहरण के लिये आगे अष्टकवर्ग प्रकरण में जो कुंडली दी गई है वह देखिये । मान लीजिये दशम भाव का नाश (नौकरी या पिता के लिये अनिष्ट) कब होगा ? दशम भाव में वृष है । इससे अष्टम धनु है—इसका स्वामी तुला के कुंभ नवांश में है जब शनि तुला के कुंभ नवांश या इसके त्रिकोण कुंभ के कुंभनवांश गा मिथुन के कुंभ नवांश पर आवेगा तब होगा । ॥ निर्याणशनिः ॥ इस श्लोक में यह बताते हैं कि मनुष्य की मृत्यु के समय शनि गोचरवश कहाँ पर होगा ।