फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसत्रहवाँ अध्याय : निर्याणप्रकरण ३२३
रन्ध्रेशो गुलिको मन्दः खरद्रेक्काणपोऽपि वा । यत्र तिष्ठति तद्भांशत्रिकोणे रविजे मृतिः ॥२॥ यह देखिये कि निम्नलिखित ग्रह किन राशियों और किन नवांशों में हैं। (१) अष्टमेश (२) गुलिक (३) शनि (४) लग्न से २२वें द्रेष्काण का स्वामी । जब शनि गोचरवश उपर्युक्त स्थानों पर (राशि और नवांश) या उपर्युक्त स्थानों से नवम या पंचम होता है तब जातक की मृत्यु होती है। ॥२॥ उद्यद्द्द्रेगाणनाथस्य तथा रन्ध्राधिपस्य च । रन्ध्रद्रेक्काणपस्यापि भांशकोणे गुरौ मृतिः ॥३॥
यह देखिये कि निम्नलिखित कहाँ हैं (१) जन्म लग्न जिस द्रेष्काण
में है उस द्रेष्काण का स्वामी (२) अष्टमेश (३) जन्म लग्न से २२वें
द्रेष्काण का स्वामी । उपर्युक्त तीनों जिस राशि या अंश में हों उस
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