भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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३२४ फलदीपिका सूर्य के गोचरवश मृत्युकाल बताया है उसका आशय यह नहीं है कि उस समय मृत्यु हो ही जायगी क्योंकि शनि तीस वर्ष में, बृहस्पति १२ वर्ष में और सूर्य एक वर्ष में पूरा परिभ्रमण कर ही लेता है। इन गोचरों को बताने का उद्देश्य यही है कि मारक ग्रह की दशा-अन्तर्दशा हो और उसमें यह निर्णय करना हो कि किस वर्ष, किस मास में मृत्यु होगी तब ऊपर लिखे प्रकार से देखना चाहिये। ॥४॥ रन्ध्रप्रभोर्वा भानोर्वा भांशकोणं गते विधौ । मृतिं वदेत्सर्वमेतल्लग्नाच्चन्द्राच्च चिन्तयेत् ॥५॥ चन्द्रमा जब गोचरवश उस राशि या नवांश पर आवे जहाँ अष्टमेश है अथवा जहाँ सूर्य है अथवा गोचरवश जब चन्द्रमा उपर्युक्त स्थानों से त्रिकोण (नवम-पंचम) पर आवे तब जातक की मृत्यु हो सकती है। जिस प्रकार उपर्युक्त श्लोकों में लग्न से विचार बताया गया है उसी प्रकार चन्द्रलग्न से भी यह सब विचार करना चाहिये । लग्नेशहीनयमकण्टकभांशकोणं प्राप्तेऽथवा शनिविहीनहिमांशुभांशम् । याते गुरौ स्वमरणन्त्वथ राहुहीन- भूसूनुभांशकगुरौ सहजप्रणाशः ॥६॥ (१) लग्नेश की राशि, अंश, कला में से यमकंटक की राशि, अंश, कला घटाइये। जो शेष बचे उसको कहिये “क”। (२) शनि की राशि, अंश, कला में से चन्द्रमा की राशि, अंश, कला घटाइये, जो शेष बचे उसको कहिये “ख”। उपर्युक्त “क” और “ख” जिन राशि