फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसत्रहवाँ अध्याय : निर्याणप्रकरण ३३३ जावे तो मृत्यु कर सकता है। (२) जन्मकुण्डली में चन्द्रमा जिस राशि में है उस राशि काँ स्वामी जिस राशि या अंश में हो या उसमे नवम या पचम जब गोचरवश शनि हो तो मृत्युप्रद हो सकता है। (३) जन्म लग्न से अष्टमेश जिस राशि या अंश में हो उसमें या उससे नवम पंचम यदि गोचर वश शनि हो तो मृत्यु कर सकता है। ॥२४॥ निशीन्दुराशौ चेज्जन्म मान्दिभेंऽशे शनौ मृतिः । दिवार्कभे चेत्तद्द्यूनत्रिकोणे वा शनौ मृतिः ॥२५॥ (१) यदि रात्रि का जन्म हो तो मृत्यु तब होगी जब शनि गोचरवश उस राशि और अंश में जा रहा हो जिस में चन्द्रमा या मान्दि हो (२) यदि दिन में जन्म है तो मृत्यु उस समय होगी जब जिस राशि और अंश में सूर्य हो उसमें अथवा उससे ५वें, ७वें या ९वें जब गोचरवश शनि जावे । ॥२५॥ रन्ध्रेश्वराद्यावति भे मान्दिस्तावति भे ततः । शनिश्चेन्मरणं ब्रूयादिति सद्गुरुभाषितम् ॥२६॥ जन्मकुण्डली में यह देखिये कि अष्टमेश से मान्दि कितने राशि और कितने अंश दूर है। जब मान्दि से इतनी ही राशि और इतनी ही अंश की दूरी पर शनि गोचरवश आवे तब जातक की मृत्यु होगी, यह सद्गुरुओ का कथन है । ॥२६॥ जन्मकालीनभृगुजात्कामशत्रुव्यये रवौ । मरणं निश्चितं ब्रूयादिति सद्गुरुभाषितम् ॥२७॥