फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३३८ फलदीपिका आश्रय लेने से होती है। ऐसा व्यक्ति लिखने में, चित्रकारी में, पुस्तक आदि के कार्य में दक्ष होता है। ऊपर दो-दो ग्रहों के एक साथ होने का फल बताया गया है। यदि दो से अधिक ग्रह एक साथ हों तो ऊपर कहे हुये फलों का तारतम्य कर फलादेश करना चाहिये । ॥५॥ भूपो विद्वान् भूपतिर्भूतुल्य- श्चन्द्रे मेषे मोषको निर्धनश्च । निस्स्वः स्तेनो लोकमान्यो महीशः स्वाढ्यः प्रेष्यश्चापि दृष्टे कुजाद्यैः ॥६॥ युग्मस्थेऽयोजीविभूपज्ञदृष्टा- श्चन्द्रे दृष्टे तन्तुवायोऽधनी च । स्वर्क्षे योधप्राज्ञसूरिक्षितीशा लोहाजीवो नेत्ररोगी क्रमेण ॥७॥ राजा ज्योतिर्विद्धनाढ्यो नरेन्द्रः सिंहे चन्द्रे नापितः पार्थिवेन्द्रः । दक्षो भूपः सैन्यपः कन्यकायां निष्णातः स्याद्भूमिनाथश्च भूपः ॥८॥ शठो नृपस्तौलिनी रुक्मकार श्चन्द्रे वणिक् स्यात्पिशुनः खलश्च । कीटे नृपो युग्मपिता महीशः स्याद्वस्त्रजीवी विकृताङ्गवित्तः ॥९॥