भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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३४४ फलदीपिका ग्रहों के दृष्ट होने से उपर्युक्त फल बताया गया है वैसा ही फल तब भी समझना चाहिये जब सूर्य किसी नवांश में हो और किसी ग्रह से दृष्ट हो । उदाहरण के लिये सूर्य धनु नवांश में हो और चन्द्रमा से दृष्ट हो तो वही फल समझिये जो चन्द्रमा के धनु नवांश में होकर सूर्य से दृष्ट होने पर होता है। या दूसरा उदाहरण लीजिये चन्द्रमा के तुला नवांश में होकर शनि से दृष्ट होने का फल बताया गया हैं वही सूर्य के तुला नवांश में होकर शनि दृष्ट होने का होगा। ।।१५।। सूर्यादितोऽत्रांशफलं प्रदिष्टं ज्ञेयं नवांशस्य फलं तदेव । राशीक्षणे यत्फलमुक्तमिन्दो- स्तद्द्वादशांशस्य फलं हि वाच्यम् ।।१६।। ऊपर श्लोक १२ से १५ तक जो फल बताया गया है वह चन्द्रमा के विविध नवांशों में स्थित होने का और विविध ग्रहों से दृष्ट होने का फल है। और श्लोक ६ से ११ तक जो फलादेश बताया गया है वह चन्द्रमा के विविध राशि में स्थित सोकर विविध ग्रहों से दृष्ट होने का फल है। अब एक नई बात कहते हैं। मान लीजिये चन्द्रमा मेष राशि में है और बृहस्पति से दृष्ट है । इसका जो फल है वह तब भी होगा जब चन्द्रमा मेष द्वादशांश में हो और बृहस्पति से दृष्ट हो । अर्थात् राशि में स्थित होकर दृष्ट होने का जो फल वही द्वादशांश में स्थित होकर दृष्ट होने का फल होता है। इस कारण चन्द्रमा किस द्वादशांश में है और किस ग्रह से दृष्ट है यह देख कर इलोक ६ से ११ के आधार पर चन्द्र द्वादशांश का फल भी कहना चाहिये । ।।१६।।