फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअठारहवां अध्याय : द्विग्रहयोग ३४५ वर्गोत्तमस्वपरगेषु शुभं यदुक्तं तत्पुष्टमध्यलघुताऽशुभमुत्क्रमेण । वीर्यान्वितोंऽशकपतिर्निरुणद्धि पूर्वं राशीक्षणस्य फलमंशफलं ददाति ॥१७॥ यदि चन्द्रमा वर्गोत्तम में हो तो ऊपर जो शुभ फल बताया गया है वह अधिक मात्रा में होगा। यदि अपने नवांश में हो तो वर्गोत्तम की अपेक्षा शुभ फल कुछ कम होगा और यदि अन्य नवांश में हो तो शुभ फल और भी थोड़ा होगा। और यदि कोई अशुभ फल बताया गया है और चन्द्रमा वर्गोत्तम में है तो वर्गोत्तम में होने से अशुभ फल कम होगा। स्व नवांश में हो तो अशुभ फल साधारण होगा और शत्रु नवांश में है तो अशुभ फल बहुत अधिक होगा। कहने का तात्पर्य यह है कि वर्गोत्तम में होना शुभता को बढ़ाता है, अशुभता को कम करता है और शत्रु नवांश में होना शुभता को कम करता है अशुभता को बढ़ाता है। अब एक दूसरी बात और कहते हैं। चन्द्रमा के दो फल बताये हैं (१) राशि में स्थित होकर दृष्ट होने का फल (२) नवांश में स्थित होकर दृष्ट होने का फल। अब यह कहते हैं कि यदि चन्द्रमा जिस नवांश में है उस नवांश का स्वामी बलवान् है तो नवांश का फल ही विशेष रूप से फलित होगा। राशि का फल उतना नहीं होगा अर्थात् नवांश के स्वामी के बली होने से नवांश को अधिक महत्त्व देना चाहिये। ॥१७॥