भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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पृष्ठ 347

उन्नीसवाँ अध्याय दशाफल भक्त्या येन नवग्रहा बहुविधैराराधितास्ते चिरं सन्तुष्टाः फलबोधहेतुमदिशन्सानुग्रहं निर्णयम् । ख्यातां तेन पराशरेण कथितां संगृह्य होरागमात् सारं भूरिपरीक्षयातिफलितां वक्ष्ये महाख्यां दशाम् ॥१॥ जिन पराशर मुनि ने नव-ग्रहों की बहुत प्रकार से आराधना की और जिनकी भक्ति से सन्तुष्ट होकर नव-ग्रहों ने उन्हें दिव्य ज्ञान प्रदान किया कि किस ग्रह की कैसी दशा जाती है उन पराशर के वाक्यों के फलादेश सम्बन्धी सिद्धान्तों की बारंबार परीक्षा कर और उनकी सत्यता का अनुभव कर मैं मन्त्रेश्वर महादशा के विषय में, पराशर ने जो कुछ कहा है उसका सार बतलाता हूँ । ॥१॥ अग्न्यादितारपतयो रविचन्द्रभौम- सर्पामिरेड्यशनिचन्द्रजकेतुशुक्राः । तेने नटः सनिजया चतुधान्यसौम्य- स्थाने नखा निगदिताः शरदस्तु तेषाम् ॥२॥ किस नक्षत्र में जन्म होने से कितने वर्ष की दशा होती है और बाद में किस ग्रह की कितने वर्ष की दशा आती है यह नीचे के चक्र से स्पष्ट होगा ।