फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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ऋक्षस्य गम्या घटिका दशाब्द- निघ्ना नताप्ता स्वदशाब्दसंख्या । रूपैर्नगैः संगुणयेन्नतेन हृतास्तु मासा दिवसाः क्रमेण ॥३॥
जन्म के समय किसी ग्रह की कितनी दशा भोग्य थी यह निकालने का प्रकार बताते हैं । यह देखिये कि जन्म के समय चन्द्रमा किस नक्षत्र में है और जन्म के बाद कितने घड़ी तक उस नक्षत्र में और रहेगा । जितनी घड़ी तक और रहेगा उन घड़ियों को महादशा के मान से गुणा कीजिये और ६० से भाग देकर यह निकाल लीजिये कि भोग्य वर्ष कितने आये । इसको एक उदाहरण से स्पष्ट किया जाता हैं । मान लीजिये जन्म के समय पुनर्वसु नक्षत्र के बीस घड़ी शेष थे । श्लोक २ में बताया गया है कि पुनर्वसु नक्षत्र में जन्म होने से बृहस्पति की महादशा में जन्म होता है इस कारण बृहस्पति की दशा में जन्म हुआ । बृहस्पति की दशा कितनी शेष है ?
२० × १६ / ६० = १६ / ३ = ५ वर्ष ४ महीने
मन्त्रेश्वर महाराज के कथन में और अन्य ज्योतिष के ग्रन्थों में यह अन्तर है कि मन्त्रेश्वर महाराज के कथनानुसार सदैव ६० से भाग देना चाहिये किन्तु अन्य ग्रंथों के अनुसार नक्षत्र का जितना पूरा मान हो उससे भाग देना चाहिये । देखिये 'सुगम ज्योतिष प्रवेशिका' दसवाँ प्रकरण । इसे नीचे समझाते हैं ।
मंत्रेश्वर महाराज के बताये हुए प्रकार में और भारतीय ज्योतिष की भुक्त भोग्य महादशा निकालने के प्रकार में थोड़ा अन्तर है ।