फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
पृष्ठ 350, कुल 684 में से
संदर्भ में पढ़ेंउन्नीसवां अध्याय : दशाफल ३४९ दोनों पद्धतियों में अन्तर निम्नलिखित है:— (i) प्रचलित पद्धति-नक्षत्र के जितने घड़ी पल बीत चुके और जितने घड़ी पल बाकी हैं—दोनों को जोड़ कर—नक्षत्र की कुल घड़ियां निकालते हैं। इसे कहिये 'क' जितने घड़ी पल नक्षत्र के बाकी हैं इन्हें कहिये 'ख'। अब मान लीजिये बृहस्पति की दशा में जन्म है तो भोग्य दशा कितनी हुई ? ∵ यदि 'क' में १६ वर्ष ∴ तो १ में १६/क वर्ष ∴ 'ख' में १६/क × ख/१ वर्ष अब भाग देकर जो वर्ष आवे—वे वर्ष, मास, दिन लिख लीजिये (ii) मंत्रेश्वर के मत से १६/६० × ख/१ वर्ष अन्तर यह हुआ कि इसमें—सम्पूर्ण नक्षत्र मान नहीं निकालते । 'क' को सदैव ६० घड़ी मानते हैं। केवल 'ख' निकालकर उसी पर गणित कर भोग्य दशा निकालते हैं। रविस्फुटं तज्जनने यदासीत् तथा विधश्चेत्प्रतिवर्षमर्कः । आवृत्तयः सन्ति दशाब्दकानां भागक्रमात्तद्दिवसाः प्रकल्प्याः ॥४॥ इस श्लोक में यह बताते हैं कि महादशा में किस प्रकार का वर्ष लेना है। ३६० दिन का चांद्र वर्ष या नक्षत्रवर्ष या सौर वर्ष। दक्षिण