फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबीसवाँ अध्याय अन्तर्दशाफल दशा और अन्तर्दशा का विशेष फल इस अध्याय में जो भावेश के सबल होने के कारण शुभ फल या अशुभ फल बताये गये हैं—वह महादशा तथा अन्तर्दशा—दोनों का विचार करते समय लागू करने चाहिये। भावेश्वरेण प्रबलेन येन यद्यत्फलं हीनबलेन येन । यदानुभोक्तव्यमनन्यसम्यक्संसूचयिष्यत्यथ संग्रहेण ॥१॥ जब किसी भाव का स्वामी प्रवल अर्थात् बलवान् होता है तब क्या फल होता है और जब वह ही निर्बल अर्थात् बलहीन होता है तब क्या फल होता है और इनका फल किस समय भोगा जावेगा यह संक्षेप में बताते हैं ॥ १ ॥ लग्ने बलिष्ठे जगति प्रभुत्वं सुखस्थितिं देहबलं सुवर्चः । उपर्युपर्यभ्युदयाभिवृद्धिं प्राप्नोति बालेन्दुवदेष जातः ॥२॥ पाकेऽर्थनाथस्य कुटुम्बसिद्धिं सत्पुत्रिकाप्तिं सुखभोजनं च प्राप्नोति वाग्जीविकया धनानि वक्ता सदुक्तिं सदसि प्रशस्ताम् ॥३॥