भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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तेईसवां अध्याय : अष्टकवर्ग ५५९ मान लीजिये शनि के गोचर का विचार करना है। सर्वाष्टक वर्ग में तो किसी राशि में ३० बिन्दु आवें किन्तु शनि के अष्टक वर्ग में उसके दो ही बिन्दु हैं तब क्या वह शुभ जावेगा ? अथवा मान लीजिये शनि के अष्टक वर्ग में तो ६ बिन्दु हैं किन्तु सर्वाष्टक वर्ग में २२ बिन्दु ही हैं तो क्या शनि का गोचर उस राशि में अशुभ जावेगा । इसका उत्तर यही है कि प्रत्येक ग्रह के स्वयं के अष्टक वर्ग में कितने शुभ बिन्दु हैं और सर्वाष्टक वर्ग में उस राशि में कितने बिन्दु हैं इन दोनों का तारतम्य कर लेना चाहिये । यदि दोनों में शुभ तो गोचर का पूर्ण शुभ फल होगा । यदि दोनों में अशुभ तो पूर्ण अशुभ फल होगा । यदि एक में शुभ और एक में अशुभ तो मध्यम फल समझना चाहिए ॥२०॥ यावन्तस्तुहिनरुचेः शुभाङ्कसंख्या यावन्तः शुभभवने हिमद्युतेर्वा। इत्थं तद्विदितमिहाधिके च तेभ्यः स्वस्त्यूने विपदिति सूचितं परेषाम् ॥२१॥ टिप्पणी :—बहुत से लोग लग्न से भी इस प्रकार विचार करते हैं : मान लीजिये प्रथम भाव में ४० शुभ बिन्दु पड़े तो प्रथम, तेरहवें, पच्चीसवें, ३७वें, ४९वें ६१वें, ७३वें वर्ष में अभ्युदय । यदि अष्टम भाव में कुल १९ बिन्दु पड़े हैं तो ८वें, २०वें, ३२वें, ४४वें, ५६वें, ६८वें वर्ष में शरीर कष्ट आदि। इस प्रकार जिस भाव में अधिक बिन्दु पड़े हों उस-उस वर्ष में और उससे प्रत्येक बारहवें वर्ष में शुभ । जिस भाव में थोड़े बिन्दु पड़े हों उस वर्ष में और उससे प्रत्येक १२वें वर्ष में कष्ट । विशेष विवरण के लिये देखिये श्री जीवनाथ शर्मा विरचित जन्म-पत्रिका विधानम् पृ० ३६-४१ ।