भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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५६० फलदीपिका प्रायः षष्ठ, अष्टम, द्वादश—यह तीनों अशुभ भवन माने जाते हैं बाकी के शुभ भवन । शुभ भवनों में अधिक बिन्दु होना शुभ है । इसी प्रकार चन्द्र लग्न से विचार कीजिये । (क) यदि चन्द्र लग्न से शुभ भवनों में २८ से अधिक संख्या हो तो उन-उन भावों की समृद्धि होती है यदि २८ से कम हो तो उन-उन भावों की हानि होती है । (ख) चन्द्रमा से किन भावों में शुभ ग्रह पड़े हैं यह देखिये । यदि इन शुभ ग्रहाधिष्ठित राशियों में २८ से अधिक बिन्दु हैं तो इन भावों की समृद्धि समझनी चाहिये । यदि २८ से कम हों उस-उस भाव सम्बन्धी विपत्ति समझनी चाहिये ॥२१॥ कतुः स्वजन्मसमयावसथग्रहाणां कृत्वाष्टवर्गकथिताक्षविधानमत्र । बह्वक्षयोगवशतः शुभराशिमास- भावग्रहस्थितिषु कर्मशुभं विदध्यात् ॥२२॥ ऊपर जो सर्वाष्टक वर्ग बनाना बताया गया है उसका एक अन्य उपयोग और बताते हैं । अपने जन्म के समय जो ग्रह जिस राशि में थे और जो जन्म लग्न और सात ग्रह—या उन आठ आधारों पर जो सर्वाष्टक वर्ग तैयार किया गया है उसमें जिस-जिस राशि में अधिक बिन्दु हों उनमें शुभ कार्य करने चाहियें । ऐसा करने से विशेष सफलता प्राप्त होगी । उदाहरण के लिये जन्म लग्न सिंह है और सिंह राशि में सर्वाष्टक वर्ग में ४० बिन्दु पड़े हैं तो जब सिंह में सूर्य हो या सिंह में चन्द्रमा हो या सिंह में बृहस्पति हो या जब पूर्वीय क्षितिज पर सिंह लग्न उदित हो तब इस कुण्डली वाला जातक जो-जो कार्य करेगा । उसमें विशेष सफलता होगी। प्रत्येक मनुष्य को कौन सा वर्ष, मास