भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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तेईसवां अध्याय : अष्टकवर्ग ५६१ या दिन अधिक अनुकूल या सफलता देने वाला होगा यह देखने के लिए सर्वाष्टक वर्ग एक साधन है ॥ २२ ॥ पापोऽपि स्वगृहस्थश्चेद्भाववृद्धिं करोत्यलम् । नीचारातिगृहस्थश्चेत्कुर्याद्भावक्षयं ध्रुवम् ॥२३॥ अब गोचर विचार के सम्बन्ध में एक नवीन सिद्धान्त और बताते हैं। यदि पापी ग्रह भी अपने भाव में जावे तो भाव की वृद्धि करता है। किन्तु यदि कोई ग्रह नीच राशि का हो या शत्रु राशि का हो तो उस भाव को बिगाड़ता है ॥ २३ ॥ स्वोच्चस्थोऽपि शुभो भावहानिं दुःस्थानपो यदि । सुस्थानपश्चेत् स्वोच्चस्थः पापी भावानुकूल्यकृत् ॥२४॥ यदि कोई ग्रह दुःस्थान का मालिक हो तो चाहे वह शुभ हो और उच्च राशि में भी हो--जिस भाव में है उस भाव को बिगाड़ेगा। किन्तु यदि सुस्थान का मालिक होकर उच्च स्थान में है तो उस भाव को बढ़ावेगा ॥२४॥ टिप्पणी :--ऊपर श्लोक २३ और २४ में जो सिद्धान्त बताये गये हैं वे यद्यपि इस अध्याय में गोचर के प्रकरण में कहे गये हैं किन्तु इनका उपयोग जन्म कुण्डली तथा गोचर दोनों में समान रूप से कर सकते हैं।