फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचौबीसवाँ अध्याय अष्टकवर्गफल अर्कस्थितस्य नवमो राशिः पितृगृहः स्मृतः । तद्राशिफलसंख्याभिर्वर्द्धयेच्छोध्यपिण्डकम् ॥१॥ अब होरासार में जो अष्टक वर्ग का फल दिया है वह बतलाते हैं। सूर्य जिस राशि में हो उस राशि से जो नवम (९वीं) राशि हो उसे “पिता का घर” कहते हैं अर्थात् उस घर से पिता का विचार करना । सूर्य के अष्टक वर्ग में—उस 'पिता के घर' में जितने शुभ बिन्दु हों— उस संख्या से "शोध्यपिण्ड" को गुणा करना । शोध्यपिण्ड कैसे बनाया जाता है, यह आगे बतलावेंगे ॥ १ ॥ सप्तविंशहताल्लब्धं नक्षत्रं याति भानुजे । तस्मिन् काले पितृक्लेशो भविष्यति न संशयः ॥२॥ यह जो (ऊपर के बताये हुए प्रकार से) संख्या आई—उस संख्या को सत्ताइस से भाग देना । शेष संख्या से जो नक्षत्र आवे (जैसे अश्विनी से १, भरणी से २, कृत्तिका से ३ आदि) उस नक्षत्र में जब गोचर में शनि आवे तो जातक के पिता को अवश्य क्लेश होता है । ॥२॥ तत्तत्रिकोणगते वाऽपि पितृतुल्यस्य वा मृतिः । संयोगः शोध्यशेषाणां शोध्यपिण्ड इति स्मृतः ॥३॥ अथवा ऊपर (श्लोक २ में) जो नक्षत्र आया है, उससे त्रिकोण में जब शनि आता है तो पिता के तुल्य—चाचा आदि की मृत्यु