भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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चौबीसवाँ अध्याय : अष्टकवर्गफल ५६३ होती है। अश्विनी की संख्या १ है—इससे त्रिकोण में मघा और मूल हुए। भरणी के त्रिकोण में पूर्वा फाल्गुनी और पूर्वाषाढ़ हुए। इसी प्रकार अन्य नक्षत्रों का त्रिकोण होता है। त्रिकोण शोधन और एकाधि- पत्य शोधन के बाद जो शुभ बिन्दु बच जाते हैं, उन्हें शोध्य पिंड कहते हैं। यह त्रिकोण शोधन और एकाधिपत्य शोधन का प्रकार आगे बतलावेंगे ॥३॥ लग्नात्सुखेश्वरांशेशदशायां च पितृक्षयः । सुखनाथदशायां वा पितृतुल्यमृतिं वदेत् ॥४॥ लग्न से चौथे घर का स्वामी जिस नवांश में हो—उस नवांश के स्वामी की दशा में पिता की मृत्यु होती है। चौथे घर के मालिक की दशा में पिता-तुल्य (चाचा आदि) की मृत्यु होती है ॥४॥ संशोध्य पिण्डं सूर्यस्य रन्ध्रमानेन वर्द्धयेत् । द्वादशेन हृताच्छेषराशिं याते दिवाकरे ॥५॥ तत्त्रिकोणगते वाऽपि मरणं तस्य निर्दिशेत् । एवं ग्रहाणां सर्वेषां चिन्तयेन्मतिमान्नरः ॥६॥ सूर्याष्टक वर्ग में जो शोध्यपिंड हो उसमें ८ जोड़िये और जो जोड़ आवे, उसमें १२ का भाग दीजिये। जो शेष बचे उस वाली राशि में (जैसे १ शेष बचे तो मेष, २ शेष बचे तो वृष इत्यादि) जब सूर्य आवे या उससे पांचवीं या नवीं राशि में जब सूर्य आवे (गोचरवश) तब पिता की मृत्यु की संभावना होती है। वैसे तो प्रतिवर्ष सूर्य उन राशियों में आता है, किन्तु यहाँ अभिप्राय यह है कि जब दशा, अन्तर्दशा के विचार से, तथा शनि के गोचर विचार से पिता की मृत्यु