प्रबोधचन्द्रोदयम् (कृष्णमिश्र यति - वेदान्त रूपक नाटक सटीक)
Prabodhachandrodaya of Krishnamishra with Commentary
कृष्णमिश्र यति द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२८ प्रबोधचन्द्रोदयम् उभौ—यथा ज्ञातमायुष्मता। एवमेतत्। क्षपणकः—तर्हि राजकार्यं किमपि मन्त्रितव्यम्। (ता लाअकज्जं किवि मन्तिदव्वम्) कापालिकः—कि तत्। क्षपणकः—सत्त्वस्य सुता श्रद्धा महाराजस्याज्ञयाह्रियतामिति । (सत्तस्स सुदा सद्धा महालाअस्स आणए आहलिअदु त्ति) कापालिकः—कथय क्वासौ दास्याः पुत्री। एष तानचिरमेव विद्या- बलादुपाहरामि। (क्षपणकः खटिकामादाय गणयति) शान्तिः—सखि, अम्बागतमिव हताशानामालापं शृणोमि तदवधा- नेन तावदाकर्णयावः। करुणा—सखि, एवं कुर्मः! (सहि एव्वं करेम्ह) (उभे तथा कुरुतः) क्षपणकः—(गाथां गणयित्वा) यथा ज्ञातम्-सत्यमवगतम्। राजकार्यम्-मोहस्येष्टसिद्धं कर्म। मन्त्रयितव्यम्-चिन्तनीयम्। सत्त्वस्य सुता-सात्त्विकी, श्रद्धेत्यस्य विशेषणम्। आह्रियताम्-आकृष्य समीपं प्राप्यताम्। दास्याः पुत्रीति निन्दायाम्। अम्बागतम्-मन्मातुः श्रद्धासम्बन्धे। हताशानाम्-नीचानाम्। आलापम्- वार्त्ताम्। अवधानेन-सावधानतया। दोनों—जैसा तुमने समझा है, ठीक है। क्षपणक—तो फिर कुछ राजकार्य सोचना चाहिये। कापालिक—वह क्या? क्षपणक—सत्त्वसुता श्रद्धा महाराजकी आज्ञासे आहृत की जाय। कापालिक—बताओ, वह अभागी कहाँ है? मै अभी उसे विद्याबलसे आहृत करता हूँ। (क्षपणक खल्लीसे गणना करता है) शान्ति—सखि, अपनी मांके विषयकी इन अभागोंकी बातें सुन रही हूं, ध्यानसे सुनें। करुणा—सखि, वैसा ही करें (दोनो सुनती हैं) क्षपणक—(गाथा गिनकर).