प्रबोधचन्द्रोदयम् (कृष्णमिश्र यति - वेदान्त रूपक नाटक सटीक)
Prabodhachandrodaya of Krishnamishra with Commentary
कृष्णमिश्र यति द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३४ प्रबोधचन्द्रोदयम् मैत्री—(सत्रासम्) अहो, हताशा घोरदर्शना। अथ तयागतया किं कृतम्। (अहो, हदासा घोलदंसणा। अध ताए आगदाए किं किदम्) श्रद्धा— श्येनावपातमवपत्य पदद्वये मा- मादाक धर्ममपरेण करेण घोरा। वेगेन सा गगनमुत्पतिता नखाग्र- कोटिस्फुरत्पिशितपिण्डयुगेव गृध्री ॥ ३ ॥ मैत्री—हा धिक् हा धिक्। (हद्धी हद्धी) (इति मूर्च्छति) श्रद्धा—सखि, समाश्वसिहि समाश्वसिहि। मैत्री—(आश्वस्य) ततस्ततः। (तदो तदो) श्रद्धा—ततः परमस्मदीयार्त्तनादोपजातदयार्द्रचित्तया देव्या— हताशा-अधमा। घोरदर्शना-भीषणाकृतिः। तया-महाभैरव्या। श्येनावपानमिति० घोरा सा श्येन इव अवपत्य श्येनावपातम् अवपत्य निपत्य पदद्वये चरणद्वये चरणद्वयावच्छेदेन माम् आदाय गृहीत्वा अपरेण मद्ग्रहणोपारूढ- करातिरिक्तेन करेण हस्तेन धर्मम् आदाय गृहीत्वा नखाग्रकोटयोः नखाग्रभागयोः स्फुरत्पिशितपिण्डयुगा धृतमांसखण्डद्वया गृध्री इव गगनमुत्पतिता आकाशे उद्- डीयतः। यथा गृध्री हठाद्भूतौ निपत्य नखाग्रभागेन पिशितखण्डयुगमादाय पुन- र्व्योम गाहते, तथैवासौ भैरवी श्येनवदुपनिपत्यैकेन करेण मम पादौ परेण च धर्ममादाय नभ उदपतत् इति भावः। 'श्येनावपातम्' इत्यत्र-'कर्तर्युपमाने' इति णमुलू ॥ ३ ॥ अस्मदीयार्त्तनादोपजातदयार्द्रचित्तया—मम धर्मस्य च करुणक्रन्दनेन करुणापर- मैत्री—(डरसे) वह अभागी बड़ी डरावनी है। उसने आकर क्या किया? श्रद्धा—बाजकी तरह झपट कर आई, हमारे दोनो चरणोंको एक हाथसे और दूसरे हाथसे धर्मको पकड़ वह दुष्टा वेगसे आकाशकी ओर उड़ी, उस समय वह ऐसी लगती थी मानो किसी गृध्रीके नखाग्रमे मासखण्ड हो और वह उड़ रही हो ॥ ३ ॥ मैत्री—हाधिक् हाधिक्! (मूर्च्छित होती है) श्रद्धा—सखि, धीरज धरो, धीरज धरो। मैत्री—(आश्वस्त होकर) तब क्या हुआ? श्रद्धा—उसके बाद हमारे आर्त्तनाद सुनकर देवीको दया हो आई और—