भारतकोश
प्रबोधचन्द्रोदयम् (कृष्णमिश्र यति - वेदान्त रूपक नाटक सटीक)

प्रबोधचन्द्रोदयम् (कृष्णमिश्र यति - वेदान्त रूपक नाटक सटीक)

Prabodhachandrodaya of Krishnamishra with Commentary

कृष्णमिश्र यति द्वारा

DevanagariHindipublished274 पृष्ठ

पृष्ठ 237, कुल 274 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 237

षष्ठोऽङ्कः २१७ शान्तिः—एष देवि, देवेन सह स्वामी विविक्ते वर्तते। तदुपसर्पतु देवी। उपनिषत्—(उपसर्पति) शान्तिः—स्वामिन्, एषोपनिषद्देवी पादवन्दनायागता। पुरुषः—न खलु न खलु। यतो मातेयमस्माकं तत्त्वावबोधोदयेन। तदेषैवास्माकं नमस्या। अथवा अनुग्रहविधौ देव्या मातुश्च महदन्तरम्। माता गाढं निबध्नाति बन्धं देवी निकृन्तति॥ ११॥ उपनिषत्—(विवेकमालोक्य नमस्कृत्य दूरे समुपविशति) पुरुषः—अम्ब, कथ्यताम्। क्व भवत्या नीता एते दिवसाः। व्यवहरतु। विविक्ते-रहसि। पादवन्दनाय=चरणयोः प्रणतये। तत्त्वावबोधोदयेन-तत्त्वावबोधोदयकारणेन। एषा-उपनिषत्। नमस्या-प्रणम्या। अनुग्रहविधाविति० अनुग्रहविधौ अनुग्रहे कर्त्तव्ये देव्याः उपनिषदः मातुश्च महत् अन्तरम् महान् भेदः। माता जननी गाढम् अत्यर्थं निबध्नाति संसारे क्षिपति, देवी उपनिषत् बन्धं संसारपाशम् निकृन्तति छिनत्ति। मातोपनिषच्चेति द्वयमपि सत्कारार्हम्, तत्रापि कृपातारतम्यालोचने तु मात्रपेक्षयोपनिषदधिकादरयोग्या, मातुः संसारे क्षेपकत्वादस्याश्च तत उद्धारे सयत्नादतो देव्युपनिषदेवाधिकादरभाजन- मिति तात्पर्यम्॥ ११॥ नीताः-गमिताः। शान्ति—देवि, यही स्वामी देवके साथ एकान्तमें कुछ बातें कर रहे हैं, देवी समीप जायं। उपनिषद्—(समीप जाती है) शान्ति—स्वामिन्, यह देवी उपनिषद् चरणोंमें प्रणाम करने आई है। पुरुष—नहीं नहीं, प्रबोधको जन्म देनेके कारण यह हमारी माता है, अतः यही मेरे लिये प्रणम्य है, अथवा— अनुग्रहके संबन्धमे माता तथा देवीमें महान् अन्तर है, माता जोरसे (स्नेह बन्धनमें) बांधती है और देवी बन्धन काटती है॥ ११॥ उपनिषद्—(विवेकको देखकर नमस्कार करके अलग बैठती है) पुरुष—मां, कहो, तुमने इतने दिन कहाँ बिताये।