प्रबोधचन्द्रोदयम् (कृष्णमिश्र यति - वेदान्त रूपक नाटक सटीक)
Prabodhachandrodaya of Krishnamishra with Commentary
कृष्णमिश्र यति द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनोट्स ( विशेष विवरण ) १ शान्तरसप्रयोगाभिनयेन इसका अर्थ यह हुआ कि शान्तरसप्रधान नाटकके अभिनयसे । यहाँ विचार करना है कि शान्तरसवाला नाटक या रूपकसामान्य तो रीतिशास्त्रविरुद्ध है फिर नाटकको यहाँ शान्तरस यह विशेषण क्यों दिया ? ‘एक एव भवेदङ्गी शृङ्गारो वीर एव वा’ इस वचनके अनुसार नाटकादिमें तदितररसप्राधान्य अयुक्त है, अत एव काव्यप्रकाशकारने — ‘शृङ्गार- हास्यकरुणरौद्रवीरभयानकाः । बीभत्साद्भुतसंज्ञौ चेत्यष्टौ नाट्ये रसाः स्मृताः’ यह लिख दिया है । शान्तिका अभिनय उपहासास्पदसा प्रतीत होता है इसीलिये सर्ववादियोंने शान्तरसको अभिनयानुपयुक्त मान लिया है । यहां ध्यान देने योग्य बात यह है कि क्यो शान्त रस नाटकानुपयुक्त है, केवल उपहास सा लगता है यह बात तो वीर रसके सम्बन्धमे भी कही जासकती है । मेरा अनुमान है कि रीति ग्रन्थ बनानेवालोंने देखाकि प्राचीन प्रसिद्ध कृतियोंमें शान्तरस प्रधाननाटकका अभावसा है अतः उन्होनें नाटकमे शान्तरस प्रयोग को अयुक्त करार दिया, वस्तुतः यह तर्कहीन नियम है। अत एव परवर्त्ती कवियोंने नाटकोंमें भी शान्तरस का प्रयोग किया और वह सफल हुए । ‘जीवानन्दम्’ ‘विद्यापरिणयनम्’ ‘अमृतो- दयम्’ ‘चैतन्यचन्द्रोदयम्’ इत्यादिमें सर्वत्र शान्तरसका अच्छा निर्वाह हुआ है और इन ग्रन्थोंके किसी भागमें सहृदय हृदयोद्वेजक कोई स्थल नहीं है फिर लकीर पीटते चलनेकी बात क्यों कर मानी जाये । अतएव इस ग्रन्थमे भी शान्तरस प्रधान रखा गया । २ अहल्यायै जारः सुरपतिरभूत् गौतम की स्त्रीका नाम अहल्या था, इन्द्रने उसका सतीत्व भङ्ग किया, यह पौराणिक कथा है । कुछ लोग यहां अहल्या शब्दको रात्रिपरक माना है और अपने पक्षकी पुष्टिके लिये अहनि लीयते या साऽहल्या यह व्युत्पत्ति की है, तदनुसार ही इन्द्र शब्दका भी सूर्य अर्थ किया है और इस पौराणिक आख्यानको दुनियासे उठाकर आकाशमें फेंक दिया है । स्वारसिक अर्थ तो गौतम की स्त्री पक्षमें ही है, यहां भी उसी अर्थसे वक्तव्यकी पुष्टि सम्भव है ।