भारतकोश
प्रबोधचन्द्रोदयम् (कृष्णमिश्र यति - वेदान्त रूपक नाटक सटीक)

प्रबोधचन्द्रोदयम् (कृष्णमिश्र यति - वेदान्त रूपक नाटक सटीक)

Prabodhachandrodaya of Krishnamishra with Commentary

कृष्णमिश्र यति द्वारा

DevanagariHindipublished274 पृष्ठ

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पृष्ठ 264

२४४ प्रबोधचन्द्रोदयम् ३ आत्मतनयां प्रजानाथोऽयासीत् ब्रह्मा ने अपनी कन्या शतरूपा के साथ मैथुन का प्रयास किया। ब्रह्मवैवर्त्त में यह कथा आई है, दण्डी कविने भी दशकुमारमे इस कथाका उल्लेख किया है, पुष्पदन्त- कृत महिम्नः स्तोत्रमें भी इसकी चर्चा है—‘प्रजानाथं नाथ, प्रसभमभिकं स्वां दुहितरं गतं रोहिद्भूतां रिरमयिषुमृष्यस्य वपुषा’ ४ अधीराक्ष्याः यहाँ पर यद्यपि अधीराक्षी पद विशेषणमात्र वाचक सा प्रतीत होता है तथापि प्राची- नाचार्य कृत व्यवहारोंके आधार पर उसे विशेष्यपरक मानकर स्त्रियाः यह अर्थ किया जाता है। अत एव वामनने भी लिखा है—‘विशेषणमात्रप्रयोगो विशेष्यप्रतिपत्तौ’॥ इसी नियमके आधारपर कवियोंने विशेष्यप्रत्यायनेच्छया विशेषणमात्रप्रयोग किये हैं— देखिये, रघुवंशमें कालिदासने लिखा है—‘निधानगर्भामिव सागराम्बराम्’ एवं सूर्यशतकमें मयूरभट्टने लिखा है—‘जम्भारातीभकुम्भोद्भवमिव दधतः सान्द्रसिन्दूर- रेणुम्’ इत्यादि । ५ ‘गौडं राष्ट्रमनुत्तमं निरुपमा तत्रापि राढापुरी’ यहाँ गौडपदसे वङ्गदेशका ग्रहण होगा, क्योकि वहाँके लिये गौडशब्दका प्रयोग अन्यत्र भी हुआ है। गौडीय माध्वमठ इत्यादिमें भी गौडशब्द वङ्गका ही वाचक है, राढा भी वहीं प्रसिद्ध है। आज भी राढी कायस्थ और राढी ब्राह्मण अपनेको समाजमें श्रेष्ठ गिनते हैं। ६ ‘कथयति भगवानिष्टान्तकाले तारकम्’ यहाँ वाराणसीमें भगवान संसारसे भीतजनको तारकमन्त्रका उपदेश देते हैं। भगवान् शब्दकी व्युत्पत्ति जो भी हो किन्तु यहाँ उसका साभिप्राय प्रयोग किया गया है, उस अभिप्रायका द्योतक वचन अथर्वशिर नामक उपनिषद्में आया है—‘अथ कस्मादुच्यते भगवानीति, यस्मादुच्चार्यमाण एको रुद्रो भवं निहत्य योगं ददाति तस्मादुच्यते भगवानीति’। इस मन्त्रकी व्याख्या इस प्रकार की जाती है—भशब्देन भवः, गशब्देन योगः, एवञ्च सति भगौ हेयत्वेन देयत्वेन यस्य स्तः स भगवान्’ भवं निहत्य योगं ददाति स भगवानित्युच्यते। तारकं तरणहेतुत्व, यह अन्वर्थ संज्ञा है। अथर्व श्रुतिमें लिखा है:— ‘मुमूर्षोर्दक्षिणे कर्णे यस्य कस्यापि वा स्वयम् । उपदेक्ष्यति तं मन्त्रं स मुक्तो भविता शिवः ॥ ७ विश्रमावती इस शब्दमें दीर्घ कैसे हुआ यह एक प्रश्न है सामान्यतः धनवती पुत्रवतीकी तरह विश्रमवती यही प्रयोग होना चाहिये । यदि विश्रमावतीको शुद्ध ही बनाना हो तो ‘मतो

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