प्रबोधचन्द्रोदयम् (कृष्णमिश्र यति - वेदान्त रूपक नाटक सटीक)
Prabodhachandrodaya of Krishnamishra with Commentary
कृष्णमिश्र यति द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबहुचोऽनजिरादीनाम्' से दीर्घ करके शुद्ध बनाले सकते हैं। रह गया गणपाठकी बात, उसकी व्यवस्था लक्ष्यानुसार होगी। ८ 'नवद्वारपुरीमध्ये आत्मा दीप इव ज्वलति दिगम्बरजैनके सिद्धान्तानुसार अङ्गुष्ठपरिमाण आत्मा हृत्पुण्डरीककोशमें दीपकी तरह जला करती है, गृहाभ्यन्तर दीपप्रभा जैसे सम्पूर्ण गृहको उद्भासित करती है उसी तरह आत्मचैतन्य सम्पूर्ण शरीरमें ज्ञानप्रवृत्त्यादि किया करता है। नवद्वार कहनेसे इन्द्रियोंको द्वार कहा है, इन्हींमेसे किसीके द्वारा प्राणनिर्गमके कारण इन्हें द्वार माना गया है—उनके यहाँ मोक्ष इस तरह वर्णित है— 'पञ्जरस्थः शुको यद्वद् विमुक्तो बन्धनाद् व्रजेत् । त्वरितं तद्वदेवात्मा विमुक्तश्चोर्ध्वगो भवेत् ॥' ९ 'सर्वे क्षणक्षयिण एव निरात्मकाश्च' बौद्धोंके अनुसार सभी पदार्थ क्षणस्थायी तथा ज्ञानस्वरूप हैं, ज्ञानस्वरूप होनेसे उन्हें निरात्मक स्वरूपेणासत् कहा है, धर्मकीर्त्तिने कहा है—'स्वाभाविकमेव संविदः स्वप्रका- शत्वं विषयास्तन्न विश्वक्प्रकाशन्ते' इति । किसी और आचार्यने भी कहा है— 'यत्तत्सत्क्षणिकं यथा जलधरः सन्तश्च भावा अमी' इति । विवेक विलासमें भी इसपर कहा है—'क्षणिकाः सर्वसंस्कारा इति या वासना स्थिरा' इति । १० 'लोकद्वयविरुद्धार्हतमतात्' आर्हतमतलोकद्वय विरुद्ध है, इहलोकविरुद्ध इस लिये कहा कि वह साक्षात् पिशाच हो जाता है, केशोल्लुञ्चन, शरीरासंस्कार, आदि पिशाच कार्य ही तो है । परलोक भी इनका ठीक नहीं है क्योंकि सततोर्ध्वगमनलक्षण परलोक क्लेशावह ही है। इनके मतका संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है—जीवोऽजीवश्चेति द्वौ पदार्थों, जीवश्चेतनः शरीरपरिमाणः सावयवः, अत्र जीवः षड्विधः—अभ्रभूभूधरादिरेकः, आस्रवसंवरनिर्जरबन्धमोक्षाख्याः पञ्च। १ 'आस्रवत्यनेन जीवो विषयेष्विति आस्रवः इन्द्रियसङ्घातः' । २. 'संवृणोति विवेकमित्यविवेकादिः संवरः' । ३. निःशेषेण जीर्यत्यनेन कामक्रोधादिः स निर्जरः, केशोल्लुञ्चनतप्तशिलाधिरोहणादिः । ४. कर्मष्टकेन जन्मपरम्परा बन्धः। ५ कर्मष्टकं तु-चत्वारि घातिकर्माणि, चत्वारि शुभानि, तेभ्यो विनिर्गतस्य जीवस्य सततोर्ध्व- गमनं मोक्षः' ११ सोमसिद्धान्तः उमया सहितः सोमः, सोमो यथा पार्वत्या सह कैलासे मोदते तद्वत् भक्तः पार्वतीत्तुल्यया कान्त्या सहितः ईश्वरवेषधारी मोदत इति चन्द्रिका टीका ।