प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तमोऽध्यायः - १२५ गूढमण्डप की फालना— कर्णतो द्विगुण भद्रं पादोनप्रतिकर्णकः । भद्रार्धं मुखभद्रं च शेषं षड्द्वसु भाजितम् ॥१८॥ कोने से दुगुणा भद्र और पौन भाग का प्रतिरथ रखे, भद्र से आधा मुखभद्र रखे । बाकी नंदी आदि छठ्ठ अथवा आठवे भाग की रखे ॥१८॥ दलेनाधेन पादेन दलस्य निर्गमो भवेत् । मूलप्रासादवद् बाह्ये पीठजङ्घादिमेखला ॥१६॥ फालनाओ का निर्गम अपना चौथा अथवा आधा भाग का रखे तथा पीठ जंघा आदि की मेखलाएं मुख्य प्रासाद के जैसी बाहर निकलती हुई बनावे ॥१६॥ गवाक्षेणान्वितं भद्र-मथ जालकसंयुतम् । गूढोऽथ कर्णगूढो वा भद्रे चन्द्रावलोकनम् ॥२०॥ गूढ मंडप के भद्र मे जाली अथवा गवाक्ष बनावे । कोने गुप्त (अंधकार मय) रखें अर्थात् दीवार बनावे अथवा भद्र मे चन्द्रावलोकन (खुला भाग) रखें ॥२०॥ त्रिद्वारे चैकवक्त्रेऽथ मुखे कार्या चतुष्किका । गूढे प्राकाशके वृत्त-मर्धोदयं करोटकम् ॥२१॥ इत्यष्टगूढमण्डपाः । गूढ मंडप मे तीन अथवा एक द्वार बनावे और द्वारके आगे चौकी मंडप बनावे । मंडप की गोलाई के विस्तार मान से आधे मान का करोटक (गूमट) का उदय रखे ॥२१॥ विशेष जानने के लिये देखे अप० सू० १८७ वर्द्धमानादि अष्टमंडप । गूमट' के उदयका तीन प्रकार— “अर्धोदयश्च यत्प्रोक्तो वामन उदयो भवेत् । कृते चैव भवेच्छान्तिः सर्वयज्ञफल लभेत् ॥ अर्धोदयश्च नवधा द्वौ भागौ परिवर्जयेत् । अनन्त उदयो नाम सर्वलोकसुखावह ॥ अर्धोदयश्च नवधा त्रयभागान् परित्यजेत् । वाराह उदयो नाम अनन्तफलदायकः ॥” ज्ञानरत्नकोशे ।