प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)
Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa with Commentary
महाकवि भास द्वारा
पृष्ठ 112, कुल 178 में से
संदर्भ में पढ़ेंधारण करने वाला बना दिया । महाराज को गृहकलह से मरने को विवश किया। सारी अयोध्या को निरन्तर रुला दिया । लक्ष्मण को हरिणों का सहवासी बना दिया । पुत्रों से स्नेह करने वाली माताओं को शोक सागर में डुबो दिया । पुत्रवधू सीता को वन मे भटकने को बाध्य किया और अपने को भी कठोर धिक्कार का पात्र बनाया । (१७) कौसला—पुत्र, सब प्रकार के शिष्टाचार को जानते हुए भी तुम अपनी जननी को प्रणाम क्यों नही करते हो ? भरत—क्या अपनी जननी को ? माँ, आप ही मेरी जननी है । माँ, मै प्रणाम करता हूँ । कौसल्या—नही, नही, यह कैकयी तुम्हारी जननी है । भरत—पहले थी । किन्तु अब नही है । आप देवी देखिए, इसने दुष्ट परिजनो के सहवास मे सत्य स्नेह को छोड़ कर बेटों से नाता तोड लिया है । आज मै संसार मे एक नये धर्म की स्थापना करने जा रहा हूँ कि जो स्त्री अपने स्वामी से विद्रोह करे, वह माँ कहलाने की अधिकारिणी नहीं है । (१८) (७) मूल कैकेयी—जात ! महाराजस्य सत्यवचनं रक्षन्त्या मया तथोक्तम् । भरतः—किमिति किमिति । कैकेयी—पुत्रको मे राजा भवत्विति । भरतः—अथ स इदानीमार्योऽपि भवत्याः कः ? पितुर्मे नौरसः पुत्रो न क्रमेणाभिषिच्यते । दयिता भ्रातरो न स्युः प्रकृतीनां न रोचते ॥ (१९) कैकेयी—जात ! शुल्कलुब्धा ननु प्रष्टव्या । भरतः—वल्कलैर्हृतराजश्रीः पदातिः सह भार्यया । वनवासं त्वयाऽऽज्ञप्तः शुल्केऽप्येतदुदाहृतम् ॥ (२०) कैकेयी—जात ! देशकाले निवेदयामि । भरतः—अयशसि यदि लोभः कीर्तयित्वा किमस्मान्