प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)
Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa with Commentary
महाकवि भास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( 112 ) अन्वय-- यत्र असौ लक्ष्मणप्रियः वर्तते, तत्र यास्यामि । अयोध्या तं विना अयोध्या न । सा अयोध्या यत्र राघवः । (२८) हिन्दी अर्थ कैकेयी—पुत्र, महाराज की प्रतिज्ञा की रक्षा के लिए ही मैने वैसा कहा था। भरत— आपने क्या कहा था ? कैकयी— कि मेरा बेटा राजा बने । भरत— तो फिर वे पूज्य राम आपके क्या हैं ? क्या राम मेरे पिता दशरथ के स्वयं के पुत्र नहीं हैं ? क्या अभिषेक ज्येष्ठ के क्रम से नहीं हुआ है ? क्या हम भाइयो मे परस्पर अनुराग नहीं है ? क्या राम का अभिषेक प्रजाओ की रुचि के अनुसार नहीं था । (१६) कैकयी—पुत्र, विवाह शुल्क की लोभी माँ से ऐसे प्रश्न नहीं पूछे जाते । भरत —तुमने राज्य को लेकर और वल्कल पहना कर राम को सीता के साथ जो पैदल वन मे भेज दिया, क्या वह भी विवाह शुल्क मे ही कहा गया था ? (२०) कैकयी— पुत्र, उपयुक्त स्थान और समय पर ही बताऊँगी । भरत— हे देवी, यदि तुम्हे अपयश ही प्रिय था, तो बीच मे ही मेरा नाम क्यो लिया ? यदि तुमको राज्य के ऐश्वर्य की कामना थी, तो महाराज से तुम्हे क्या नहीं मिल सकता था ? यदि तुम्हे ‘राजमाता’ कहलाने की ही अभिलाषा थी, तो सच बताना, क्या राम तुम्हारे पुत्र नहीं है ? (२१) तुमने बहुत बुरा किया है । तुमने राज्य के लोभ के कारण महाराज के जीवन की भी चिन्ता नहीं की और ‘वन मे जाओ’ यह कह कर बड़े पुत्र राम को भी वन मे भेज दिया । सीता को वल्कल पहने देखकर भी तुम्हारी छाती नहीं फटी, यह बड़े आश्चर्य की बात है । लगता है, विधाता ने तुम्हारे हृदय को वज्र के से भी अधिक कठोर बनाया है। (२२) सुमन्त्र — कुमार, प्रजावर्ग और अमात्यो के साथ महर्षि वसिष्ठ और वामदेव आपके राज्याभिषेक के लिए आपको सूचित कर रहे हैं कि—