प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)
Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa with Commentary
महाकवि भास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( 132 ) प्रेमी और स्नेही के बिना स्वर्ग में अपने अन्य पूर्वज राजाओं के क्या आनन्द पाते होंगे । (१७) सुमन्त्र—(दुःखपूर्वक) महाराज की मृत्यु, आपका वनवास, भरत की पी- परिवार का रक्षकहीन होना आदि अनेक प्रकार के कष्टों को दि- कर मेरी लम्बी उम्र ने गुणों के साथ दोष ही अधिक दिए हैं । (१८) सीता—तात रोते हुए पतिदेव को और भी अधिक रुला रहे हैं । राम—सीते, यह मैं अपने आपको सँभाल रहा हूँ । वत्स लक्ष्मण, जरा पानी तो लाओ । लक्ष्मण—जैसी आपकी आज्ञा । भरत—आर्य, यह उचित नही है । छोटा होने के कारण वारी तो मेरी है । मैं ही जल लाऊँगा । (कलश लेकर, बाहर जाकर, पुनः अन्दर आकर) यह जल है । राम— (आचमन करके) सीते, अब तो लक्ष्मण का काम छिन रहा है । सीता—पतिदेव, इसे भी तो सेवा करनी चाहिए । राम—ठीक है । यहां वन में लक्ष्मण सेवा करे और वहाँ अयोध्या में भरत । भरत—आर्य प्रसन्न होइए । मैं यहाँ पर शरीर से रहूँगा तथा वहाँ तो केवल मेरा प्रबन्ध रहेगा राज्य की रक्षा तो आपके नाममात्र से ही हो जायेगी । (१९) राम—हे वत्स भरत, ऐसा मत कहो । हे वत्स, मैं पिता की आज्ञा से वन में आया हूँ । न तो मैं अभिमान से यहाँ आया हूँ, न भय से अथवा न चित्त के पागलपन से । हमारा रघुकुल सत्य के लिए प्रसिद्ध है, यह मैं तुमसे कह रहा हूँ । इसे जानते हुए भी तुम निम्न पथगामी क्यों बन रहे हो । (२०) सुमन्त्र—तो फिर अब राज्याभिषेक किसका होना चाहिए ? राम—उसी का होवे, जिसके लिए जननी ने कहा है । भरत—आप प्रसन्न होइए । आर्य, अब घाव पर नमक न छिड़कें । हे गुणज्ञ मेरा जन्म भी उसी कुल में हुआ है, जिसकी आप शोभा हैं । मेरे पिता भी वे ही प्रशस्त बुद्धि वाले हैं, जिनके आप यशस्कर