भारतकोश
प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)

प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)

Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa with Commentary

महाकवि भास द्वारा

DevanagariHindipublished178 पृष्ठ

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पृष्ठ 134

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सीता—आर्ये, आश्रम में बिखरे हुए पूजा के फूलों को साफ कर दिया । आश्रम सुलभ फल फूल आदि से देव पूजा भी कर ली । तो अब जब तक पतिदेव नहीं आते हैं, मैं इन छोटे पौधों को जल से सींच लूँ । तापसी—तुम्हारा यह कार्य बिना बाधा के होवे । (इसके बाद राम आते हैं) राम—(खेद पूर्वक) पिताजी और मुझ से रहित उस सुन्दर अयोध्या को छोड़ कर, मेरे अभिषेक की सारी सामग्री साथ लेकर भरत मेरे पास आया । मैंने पुनः उस गुणों के आगार भरत को राज्य के पालन के लिए वहीं पर भेज दिया । बड़े कष्ट की बात है कि पिताजी के राज्य के भारी भार को वह अकेला ही खेच रहा है । (१) (सोच कर) यह राजकार्य ऐसा ही है । तो अब मैं ऐसी चिन्ताओं से मुक्ति पाने के लिए मेरी सहचरी सीता को देखूँ । सीता अभी कहाँ गई होगी ? (घूम कर और देख कर) अरे, ये तत्काल सींचे गए पौधों के थाल बता रहे हैं कि सीता यहीं कहीं पास में है । क्योंकि— पेड़ों के थालों में पड़ा झाग वाला जल अभी भी घूम रहा है और प्यासे पक्षी पास आकर भी इस मैले पानी को नहीं पी रहे हैं । जल से भीगे कीड़े अपने बिलों से भाग कर बाहर आ रहे हैं तथा पेड़ों की जड़ों में कई गोलाकार रेखाएं पड़ गई हैं । (२) (देख कर) अरे, सीता तो यह रही । हाय, बड़ा दुःख है । इसका हाथ कभी दर्पण उठाने में भी थक जाता था, वही हाथ अब घड़ा उठाने में भी नहीं थकता । वनवास ने लताओं के साथ नारी की सुकुमारता को भी कठोरता में बदल दिया है । (३) (पास जाकर) सीते, क्या तुम्हारा तप बढ़ रहा है ? सीता—अरे, पतिदेव । आर्यपुत्र की जय हो । राम—सीते, यदि तुम्हारे धार्मिक कार्य में कोई रुकावट न हो, तो बैठ जाओ । सीता—जैसी आपकी आज्ञा । (बैठती है) राम—सीते, लगता है जैसे तुम कुछ पूछना चाहती हो ? क्या बात है ? सीता—आपके मुख से लग रहा है मानो आपका हृदय किसी दुःख से सना हो रहा है । यह क्या है ?