प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)
Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa with Commentary
महाकवि भास द्वारा
पृष्ठ 147, कुल 178 में से
संदर्भ में पढ़ें( 160 ) सीता—आर्य पुत्र, बचाओ, बचाओ । हे लक्ष्मण, मुझे बचाओ, बचाओ । रावण—हे दीर्घ नेत्रों वाली सीते, इस तरह क्यों विलाप कर रही हो ? जिस प्रकार तुम्हारे पतिदेव हैं, मुझे भी वैसे ही समझो । यह राम मुझसे लड़ने मे असमर्थ है, भले ही बहुत अधिक शक्ति से युक्त एवं देवताओ के समूह के साथ ही क्यों न हो । (१६) सीता—(क्रोध में) मैं तुझे शाप देती हूं । रावण—अहा हा, वाह रे पतिव्रता का तेज । जो मैं आकाश मे चलते समय सूर्य की किरणो से भी नही जलता, वह इसके "मै शाप देती हूँ" इन थोडे से अक्षरो से कैसे जलूँगा । (२०) सीता—आर्य पुत्र, रक्षा करो, रक्षा करो । रावण—(सीता को लेकर) अरे रे, जनस्थान मे रहने वाले तपस्वियो, आप लोग सुनें । यह रावण सीता को बलपूर्वक लेकर जा रहा है । यदि राम को क्षात्र धर्म पर कुछ आस्था हो, तो वह अपना पराक्रम प्रकट करें । (२१) सीता—आर्य पुत्र, रक्षा करो, रक्षा करो । रावण—(घूमते हुए देख कर) अरे, अपने पंखो की तेज वायु से सारे वनवृक्षों को कम्पित कर देने वाला ओर भयानक चोंच वाला यह जटायु मेरी तरफ ही दौट रहा है । अरे, जरा ठहर तो, मैं अपने हाथो मे तीखी तलवार को निकाल कर तेरे पंखो को काटता हूँ ओर तुझे खून से भिगो कर यमलोक भेजता हूँ । (२२) (दोनो का प्रस्थान) पाँचवाँ अंक समाप्त