प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)
Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa with Commentary
महाकवि भास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( 190 ) भरतः—अनुगृहीतोऽस्मि । आर्य ! प्रतिगृह्यता राज्यभारः । रामः - वत्स ! कथमिव । कैकयी—जात ! चिराभिलषितः खल्वेष मनोरथः । शब्दार्थ—भ्रातृवत्सलः = भाई से स्नेह रखने वाला । श्वश्रूजनपु- रोगं = सासुएँ जिसके आगे चल रही हैं, ऐसे भरत को । अवलोकयितुम्=देखने को । विशालीक्रियता=दीर्घ बनाओ । एष्टव्ये = अभीष्ट, चाहे गए । समा- तृकः = माताओं के साथ । प्रवृद्धंविपर्यं = अनेक प्रकार के । विपमैः = संकटों से । विमुक्तं = विरहित या छूटा हुआ । अमलं = स्वच्छ । शरदि = शरद् ऋतु में । सोमम् = चन्द्रमा को । आर्यासहाय = सीता के सहित । गुरुं = पूज्य को । दिदृक्षुः = देखने का इच्छुक । तुष्टहृदयः = प्रसन्न मन वाला । स्वज- नानुबद्धः = अपने आदमियों द्वारा पीछे-पीछे आते हुए । अम्बाः = हे जननियो । वर्धामहे=आनन्द से परिपूर्ण हैं । अवसितप्रतिज्ञं = पूर्ण व्रत वाले । सह वध्वा= बहू सीता के साथ । चिरमङ्गला = बहुत समय तक कल्याण प्राप्त करने वाली । अनुगृहीत = कृपा से युक्त । आर्यपुत्रेण = राम के साथ । चिर- सञ्चारी = बहुत समय तक साथ चलने वाले अर्थात् सुख भोगने वाले । प्रति- गृह्यता = स्वीकार करो । चिराभिलषितः = बहुत समय से इच्छित । अन्वय —अयं भ्रातृवत्सलः त्वद्दर्शनसमुत्सुकः भरतः महता सैन्येन मातृभिः सह सम्प्राप्तः । (५) अन्वय—अद्य तुष्टहृदयः अहम् स्वजनानुबद्धः शरदि मेघैः विमुक्तम् अमलं सोमम् इव तैः तैः प्रवृद्धविपर्यैः विषमः विमुक्तम् आर्यासहाय गुरुं दिदृक्षुः प्राप्तः अस्मि । (६) अन्वय—यह पद्य अंक ४, पद्य १६ में पहले आ चुका है । (७) हिन्दी अर्थ (प्रवेशक रुके) लक्ष्मण—आर्य की जय हो ! हे आर्य, भाई से स्नेह रखने वाला, आपके दर्शन के लिए लालायित बना यह भरत विशाल सेना को लेकर माताओं के साथ यहां आ गया है । राम—वत्स लक्ष्मण, क्या ऐसा ? भरत आ गया है । लक्ष्मण—आर्य, और क्या ।