भारतकोश
प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)

प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)

Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa with Commentary

महाकवि भास द्वारा

DevanagariHindipublished178 पृष्ठ

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( 37 ) सुग्रीवरामः = अच्छे कण्ठ वाले राम । सहलक्ष्मणः = लक्ष्मण के सहित । रावणारि = रावण के शत्रु । अप्रतिमः = निरुपम वीर । देव्या = सीता के साथ । विभीषणात्मा = शत्रुओं के लिए भयकर । भरतः = श्रीराम (भरः भरणम् जगद्रक्षणम् त तनोति इति भारतः अर्थात् ससार की रक्षा करने वाले) । अनुसर्गम् = जन्म-जन्म मे (सर्गे सर्गे प्रति अनुसर्गम् अर्थात् जन्मनि-जन्मनि 'प्रादुर्भावम्) । नेपथ्याभिमुखम् = पर्दे की ओर । अवलोक्य = देख कर । शरत्कालम् = शरद् ऋतु के । अधिकृत्य = सम्बन्ध मे । चरति = चल रही है । पुलिनेषु = किनारो पर । काशांशुकवासिनी = काश के फूलों के समान धवल प्रकाश वाली । सुसंहृष्टा = प्रसन्न हृदय वाली । मुदिता = प्रसन्नचित्त वाली । नरेन्द्रभवने = राजमहल में । त्वरिता = शीघ्रतापूर्वक । प्रतिहाररक्षी इव = द्वारपालिका के समान । स्थापना = प्रस्तावना । अन्वय—सीताभव. सुमन्त्रतुष्टः सहलक्ष्मणः च सुग्रीवरामः अनुसर्गम् पातु । यः च रावणार्यप्रतिम. देव्या विभीषणात्मा भरतः । (१) अन्वय---काशांशुकवासिनी सुसंहृष्टा हसी पुलिनेषु चरति, नरेन्द्रभवने मुदिता त्वरिता प्रतिहाररक्षी इव । (२) हिन्दी अर्थ (नान्दी पाठ के अन्त मे सूत्रधार आता है ) सूत्रधार — सीता के जीवन, सद् विचार से सन्तुष्ट, लक्ष्मण के सहचर और सुन्दर शरीर वाले राम जन्म-जन्मान्तर में आप दर्शको की रक्षा करें, जो रावण के शत्रु, अद्वितीय वीर, सीता देवी के साथ, शत्रुओं को भयभीत करने वाले तथा संसार का भरण-पोषण करने वाले हैं । (१) (नेपथ्य की ओर देख कर) आर्ये, जरा इधर तो आना । नटी — आर्य, यह आ गई हूं । सूत्रधार — अब इसी शरद् ऋतु के सम्बन्ध में कुछ गाओ । नटी — आर्य, ठीक है । (गाती है ।) सूत्रधार — अरे, इस शरद् ऋतु के समय में — काश के पुष्पो के सदृश श्वेत प्रकाश वाली हसी प्रसन्न चित्त होकर नदी के तट पर विचरण कर रही है ।