प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)
Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa with Commentary
महाकवि भास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( 40 ) (प्रवेश करके) काञ्चुकीय—देवी, यह मैं हूं । क्या किया जाए ? प्रतिहारी—आर्य, देवासुर युद्ध में अद्वितीय पराक्रम वाले महाराज दशरथ आज्ञा दे रहे हैं कि—शीघ्र राजकुमार राम के राजोचित प्रभुत्व के परिचायक राज्याभिषेक की सारी सामग्रियां प्रस्तुत की जायें । काञ्चुकीय—हे देवी, महाराज ने जो आदेश दिया है, वह सब पूरी तरह से तैयार है । देखो— ये छत्र और चंवर हैं । ये आनन्ददायक वाजे हैं । यह मांगलिक आसन भी तैयार है । यहा कुश और पुष्पों के सहित, सोने के बने हुए घड़ों मे तीर्थों का जल भी भर. कर रख दिया है ।.क्रीड़ा रथ भी जुता हुआ खड़ा है । मन्त्रियों के साथ पुरवासी लोग भी आ गए हैं और इस समूचे मंगलदायक आनन्द के करने वाले ये भगवान् वशिष्ठ भी वेदी पर विराजमान हैं । (३) प्रतिहारी—यदि ऐसा है, तो बहुत सुन्दर किया । काञ्चुकीय—अहो, बडे हर्ष की बात है । इस समय पृथ्वी पर राम नाम वाले चन्द्र का राज्याभिषेक करके राजा दशरथ ने अपनी प्रजा को सफल मनोरथ वाली कर दिया है । (४) प्रतिहारी—आप अब शीघ्रता कीजिए, शीघ्रता कीजिए । काञ्चुकीय—हे देवी, यह शीघ्रता कर रहा हूं । (निकल जाता है) प्रतिहारी—(घूम कर और देख कर) आर्य सम्भवक, सम्भवक, जाओ, और तुम भी महाराज के आदेशानुसार पूज्य पुरोहित को सम्मान सहित शीघ्र बुला लाओ । (दूसरी ओर जाकर) अरी शारसिके, शारसिके, नाटक गृह मे जाकर अभिनय करने वालों से कहो कि—वे आज सामयिक अभिनय दिखाने को तैयार रहे । तब तक मैं भी "सब कुछ तैयार है" ऐसी सूचना महाराज को देती हूं । (निकल जाती है ।) (३) मूल (ततः प्रविशत्यवदातिका वल्कलं गृहीत्वा) अवदातिका—अहो अत्याहितम् । परिहासेनापीमं वल्कल- मुपन- यन्त्या ममैतावद् भयमासीत्, किं पुनर्लोभेन परधनं हरतः । हसितुमिवेच्छामि । न खल्वेकाकिन्य हसितव्यम् ।