प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)
Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa with Commentary
महाकवि भास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( 50 ) अन्वय—कर्णौ त्वरापहृतभूषणभुग्नपाशी, हस्तौ च संस्रसिता- गौरतलौ, गात्रे आभरणभारनतानि एतानि स्थानानि तावत् समता उपयान्ति । (८) हिन्दी अर्थ राम—तब उस समय— शत्रुघ्न और लक्ष्मण ने तीर्थजल के घड़े को थामा, रोते हुए म राज ने स्वतः छत्र सम्भाला और इस प्रकार अभिषेक का क प्रारम्भ हुआ। इतने मे ही हाफती हुई मन्थरा ने आकर राजा कानों मे धीरे से कुछ कहा और में राजा नहीं हुआ। (७) सीता—यह मुझे अच्छा लगा । महाराज महाराज ही रहे और आर्य आर्यपुत्र ही रहे । राम—सीते, गहनों को क्यो उतार डाला ? सीता—नही, नही, पहना करती हूँ । राम—नही तो, पहनती तो हो। गहने अभी ही उतारे जान पड़ते हैं क्योकि-- शीघ्रता में आभूषण उतारने के कारण कानो के छेद अभी भी हु नीचे की ओर झुके हुए हैं। हस्ताभरण उतारने के कारण दब पड़ने से हथेलियो का रंग अभी भी पहले की तरह नही हुआ है आभूषणो के भार से झुके हुए तुम्हारे शरीर के ये अवयव अभी त स्वाभाविक दशा को प्राप्त नहीं कर सके है। (८) (६) मूल सीता—पारयत्यार्यपुत्रोऽनीकमपि सत्यमिव मन्त्रयितुम् । रामः—तेन हि अलङ् क्रियताम् । अहमादर्शम् धारयिष्ये । (तथ कृत्वा निर्वर्ण्य) तिष्ठ । आदर्शे वल्कलानीव किमेते सूर्यरश्मयः । हसितेन परिज्ञात क्रीडेयं नियमस्पृहा ॥ (६) अवदातिके ! किमेतत् ? अवदातिका--भर्तः ! "किन्नु खलुशोभते न शोभते' इति कौतूहलेन वस्त्राणि ।