भारतकोश
प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)

प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)

Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa with Commentary

महाकवि भास द्वारा

DevanagariHindipublished178 पृष्ठ

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पृष्ठ 55

( 52 ) हिन्दी अर्थ सीता—आप असत्य को भी सत्य के समान कह सकते है । राम—तो फिर तुम आभूषण पहनो । मैं काच दिखाता हूँ । (वैसा करके, देख कर) ठहरो । दर्पण में यह कुछ वल्कल-सा दीख रहा है। कही ये सूर्य की किरणें तो नही है । अच्छा, तुम्हारी हँसी ने सारा रहस्य बता दिया । सच बताओ, क्या इसे हँसी खेल मे पहना है अथवा साधना करने का ही विचार है । (६) अवदातिके, क्या बात है ? अवदातिका—स्वामी, "क्या यह अच्छा लगता है अथवा नही" इसी उत्सुकता मे पहन लिया है । राम—सीते, क्या ऐसा ही है । तुमने तो इक्ष्वाकुवंशियो की वृद्धावस्था के आभूषण इस वल्कल को धारण कर लिया है। हमारी भी इसमे रुचि है । लाओ तो । सीता—नही, आप ऐसी अपशकुन की बात मत करिए । राम—हे सीते, तुम क्यो मुझे रोक रही हो ? सीता—अभी-अभी आपका अभिषेक होते-होते रुक गया है । अत. आपका वल्कल धारण करना मुझे अशुभ-सा लगता है । राम—हास-परिहास मे तुम स्वयं दैन्य (मन्यु) को उत्पन्न मत करो अर्थात् विनोद मे अमगल की आशंका मत करो। क्योकि जब मेरी अर्धाङ्गिनी होकर तुमने पहले ही वल्कल पहन लिया, तो समझो मैने भी पहन लिया । (१०) (नेपथ्य में) हाय, हाय, महाराज ! सीता—आर्य पुत्र, यह क्या है ? राम—(सुनकर) पुरुषो और स्त्रियो का जब यह सम्मिलित 'आर्त्त स्वर सुनाई पड़ रहा है, इससे प्रतीत होता है कि विधाता ने यह सिद्ध करने के लिए कि "मै सर्वशक्तिमान हूँ" मूल पर ही प्रहार किया है । (११) इस कोलाहल का शीघ्र पता लगायो ।