पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६२ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व ॥ चालुक का कहना कि रात सें युद्ध नहीं करना प्रात भये युद्ध करेंगे ॥ दूहा ॥ राज सुनौ चालुक कहै । है थप्पंरि इक्क कंध ॥ राति परी जुध नहि करै । प्रात करैं फिर जुद्ध ॥ छं० ॥ ४६१ ॥ रु० २१८ ॥ ॥ दोनों योद्धाओं का अपने २ डेरों पर आना और चालुक के मंत्रियों का एक झूठी पत्री बनाना ॥ अरिल्ल ॥ अपने अपने डेरा आए । सब घायल के घाव बँधाए ॥ मिले सकल चालुक के मंचिय । झूठी एक बनाई पत्रिय ॥ छं० ॥ ४६२ ॥ रु० ॥ २१८ ॥ ॥ चालुक के मंत्रियों का उसे एक झूठी पत्री देकर घर भेज दैना ॥ अरिल्ल ॥ सो कर जाइ राज कै दिन्निय । तुम घर जाहु कहा वक थन्निय ॥ डोली करि चालुक्क चलाए । सब मंची मिलबे कौं आए ॥ छं० ॥ ४६३ ॥ रु० ॥ २२० ॥ ॥ चालुक के मंत्रियों का बीसलदेवजी के मंत्रियों से मिल संधि कर लैना ॥ अरिल्ल ॥ सब मंची परधान थान पर । बोलि लए पावासर तोंअर ॥* हम सु तुम्हारै पाइन आए । कपट निपट करि राव चलाए ॥ छं० ॥ ४६४ ॥ रु० ॥ २२१ ॥ इक्क सु बोल गज तोल चलावै । राज कहै सो मान्न मँगावैं ॥ छं० ॥ ४६५ ॥ रु० ॥ २२२ ॥ २१८ पाठान्तर :- करें । कहै । भये । करै ॥ २१८-२२ पाठान्तर :- अपनें २ । घाउं । बंधाए । मंत्री । पत्री ॥ २१९ ॥ जायं । दीनीय । थंनिय । चालुकं । करी । कों । कूं । आये ॥ २२० ॥ परधांन । यांनं । तुम्हारे । पायन ॥ २२१ ॥ इहां । सोल । चलायौ । मंगायौ । तहं ॥ २२२ ॥ * यह तुक सं० १६४३ और १७७० की पुस्तकों में नहीं है ॥