पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
पृष्ठ 104, कुल 470 में से
संदर्भ में पढ़ेंआदि पर्व ] पृथ्वीराजरासौ । ६३ ॥ पावासुर का बीसलदेवजी को संधि कर लेने के समाचार कहना ॥ अरिल्ल ॥ राजन पास गए पावासुर । तहां बोलि किरपान्न नृप नर ॥ चालुक के संदी आये मिल । संगो मान धरै प्रभु पग तत्त ॥ छं० ॥ ४६६ ॥ रू० ॥ २२३ ॥ ॥ बीसलदेवजी का संधि स्वीकार कर वहां महल बनाने और नगर बसाने को कहना ॥ अरिल्लं ॥ फिर राजन कही तुम जानौ । मेरो उहाँ महल हु थानौ ॥ एक मास में नगर बसावौ । इतनी कहि अरु पाइन आवौ ॥ छं० ॥ ४६७ ॥ रू० ॥ २२४ ॥ ॥ माल मँगा कर बीसलपुर बसाना और वहां से पीछा फिरना ॥ दूहा ॥ पावासर तोंअर कहे । भरें कोरि कौ भाग ॥ जब ही माल मँगाइ करि । नगर बसावन लाग ॥ छं० ॥ ४६८ ॥ रू० ॥ २२५ ॥ जीति खेत चहुआन नृप । चालुक धाय अधाय ॥ फिरि बाहुरि बीसल चल्यौ । बीसल नगर वसाय ॥ छं० ॥ ४६९ ॥ रू० ॥ २२६ ॥ सो संवत नव सत्त अर्ध । बरस तीस कछ अग्ग ॥ पुर पहन बीसल नृपति । राजत सयन्तह जग्ग * ॥ छं० ॥ ४७० ॥ रू० ॥ २२७ ॥ २२३-२२४ पाठान्तर :-कें । कै । पांइन । ताले ॥ २२३ ॥ राजन । राजन । जानो । इहं । मंल्लिहू । हाँ । मैं । वंसायौ । वसाउ । पायना । आयौ ॥ २२४ ॥ २२५-२७ पाठान्तर :-कहै । भरै । भरैं । मंगांय । वमाउन ॥ २२५ ॥ जीती । चहुंआंन । चहुंवान । नृप । धाय । फिरिं ॥ २२६ ॥ सत । अंध । अगि । जगिग ॥ २२७ ॥
- इस रूपक में कहे संवत् के विषय में हमारी टिप्पण १६८ पढ़ो और विचार करो । इस ग्रंथ के रूपक १६८ में बीसलदेवजी के पाट बैठने का संवत् ८२१ कहा है परंतु ख्यातियों में सं० ९३१ भी मिलता है । उन के राज्य करने के वर्ष ६४ कवि ने बता ही दिये हैं अतएव यह रूपक पाट बैठने के रूपक १६८ में आठ सै के स्थान में नो सैं अथवा नव सैं का पाठ होना स्वयम् सिद्ध करता है क्योंकि जो ऐसा न माने तौ । ११८ वर्ष का राज्य समय होगा । ख्याति में लिखे बीसलदेवजी के पाट बैठने के संवत् के अनुसार जो लेखा लगा कर हमने टिप्पण १६८ में संवत् १०८६ सिद्ध किया है वही कर्नल टॉड साहब भी नीचे लिखे प्रमाण अनुमान करते हैं :-